Subhash Chandra Bose Jayanti: नेताजी के प्रेरक प्रसंग सदैव रहेंगे प्रासंगिक

By डॉ. रमेश ठाकुर | Jan 22, 2025

असाधारण कौशल नेतृत्व करने वाले करिश्माई सुभाष चंद्र बोस उर्फ ‘नेताजी’ की आज 128वीं जयंती हैं। उनके योगदान को आज पूरा देश याद कर रहा है। जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक, उड़ीसा में हुआ था। बोस के प्रेरक वचनों को मौजूदा समय के लोग क्या, आने वाली पीढ़ियां भी अनवरत अनुसरण करती रहेंगी। उनके व्यक्तित्व के संबंध में जितनी भी व्याख्याएं शब्दों से जाएं, कमतर हांगी। क्योंकि ऐसे महापुरूष विरले धरा पर आते हैं। बोस के अवतरण ने इस धरती को भी गौरवांतित किया था। वो ऐसे भारतीय राष्ट्रवादी योद्वा थे, जो देशभक्ति की अलख जगाने में असंख्यक लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़कर गए। उनकी नेतृत्व क्षमता से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित थे, तभी उनको बड़ी जिम्मेदारी दीं। प्रत्येक जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया। बोस ने अपने विचारों से देश के युवाओं को प्रेरित किया था। बोस कहते थे कि अगर जीवन में संघर्ष न हो, तो जीवन का अर्थ नहीं? उन्होंने कहा था, व्यक्ति के अंदर सनक नहीं होगी, तो वह महान नहीं बनेगा। बोस का एक प्रेरक प्रसंग जिसे लोगों ने अपने जीवन में उतारा, वह ये है ‘अगर कभी झुकने की नौबत आए, तब भी वीरों की तरह ही झुकना। 

नेताजी द्वारा गठित ’आजाद हिंद फौज’ ने आजादी की लड़ाई को बड़ा संबल दिया। उनका प्रसिद्ध नारा ’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’, बोलने मात्र से हमारे भीतर नई चेतना जगाता है। उनसे जुड़ी कई घटनाएं ऐसी हैं जो चमत्कारी और अद्भुत रही। अव्वल तो उनकी मौत? जो रहस्यमय तरीके से 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में हुई। बोस की मौत कब तक संसार के लिए पहेली रहेगी, जिसकी तारीख-दिन शायद कभी मुकर्रर हो? मौत को लेकर कई तरह के भ्रम हैं। कोई कहता है विमान के जलने से उनकी मृत्यु ताइवान के अस्पताल में हुई? कोई कहता है वह उसके बाद भी जीवित रहे, लेकिन दुनिया के सामने नहीं आए? आजादी से लेकर अब तक की सरकारों ने भी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं कीं।

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बहरहाल, प्रेरणा के लिए बोस का संपूर्ण जीवनकाल न सिर्फ भारतीयों के लिए, बल्कि समूचे संसार के लिए किताब जैसा है। उन्हें जितना पढ़ेंगे, उतना ही ज्ञानवान होंगे। सुभाष चंद्र बोस सबसे प्रभावशाली स्वतंत्रता सेनानी नेताओं में गिने जाते थे। ’जय हिंद’ और ’दिल्ली चलो’ के नारों ने अंग्रेजों के पसीने छुडा दिए थे। उनके आह्वान मात्र से लोगों की भीड़ एकत्र हो जाती थी। जबकि, मौजूदा समय के विभिन्न दलों के राजनेता भाड़े से बुलाकर भी उतने लोग अपनी सभाओं में खडा नहीं कर पाते? ये तथ्यात्मक है कि आजाद हिंद फौज के गठन से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कोई नहीं भुला सकता। बोस स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अपनाए गए अपने उदारवादी दृष्टिकोण और समाजवादी नीतियों के लिए जाने जाते थे। 

उनके शुरुआत से लेकर अंत तक के जीवन पर प्रकाश डालें, तो नेताजी के पिता कटक के सफल अधिवक्ता हुआ करते थे जिन्हें ‘राय बहादुर’ के नाम से भी जानते थे। बोस की शुरुआती शिक्षा कटक के ही प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में हुई थी। बाद में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उम्र जब 16 वर्ष की हुई तो स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण की रचनाओं को पढ़ना शुरू किया जिससे वह काफी प्रभावित हुए। यहीं से उनका जीवन बदल गया। नेताजी सिविल सेवा करना चाहते थे जिसकी तैयारी के लिए इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। वर्ष-1920 में उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी बीच अप्रैल 1921 में, भारत में राष्ट्रवादी उथल-पुथल होना शुरू हुआ, जिसको देखकर उन्होंने अपनी नौकरी नहीं, बल्कि देश आजाद करने का निर्णय लेकर भारत वापस आ गए। 

भारत आकर तुरंत ‘असहयोग आंदोलन’ से जुड़ गए। आंदोलन के दौरान, उन्हें महात्मा गांधी ने चितरंजन दास के अधीन कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी। जो उनके राजनीतिक गुरु भी बने। उसके बाद, वह बंगाल कांग्रेस स्वयंसेवकों के युवा शिक्षक और कमांडेंट भी बनाए गए। कुछ सालों तक वह ’स्वराज’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया। आजादी के लड़ाई में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सन 1927 में जब जेल से रिहा हुए तो, कांग्रेस पार्टी के महासचिव बने और स्वतंत्रता के लिए जवाहरलाल नेहरू के साथ काम करना आरंभ किया। बोस कम उम्र से ही सफलता की सीढ़ियां तेजी से चढ़ते गए। उनके बढ़ते कदम अन्य नेताओं को असहज करने लगे थे। 1938 में उनको भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। तब उन्होंने एक ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ का गठन किया, जिसमें व्यापक स्तर पर औद्योगीकरण नीतियां तैयार की गईं। 23 जनवरी वह तारीख है जिस दिन बोस के योगदान की भूमिकाओं को हम याद करते हैं। आज उनकी 128वीं जयंती पर उन्हें पूरा देश याद करेगा।

आजाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए भारत के नौजवान आतूर रहते थे। तब, हर कोई नेजाती से जुड़ना चाहता था। अंडमान को जापानियों से मुक्त भी उन्होंने बड़े अनोखे अंदाज में करवाया था। अपनी फौज के साथ वह अंडमान गए और जापानियों को वहां से खदेड़कर कब्ज़ा मुक्त करवाकर भारत का झंडा फहरा दिया। 1944 की शुरुआत में, आज़ाद हिंद फ़ौज की तीन इकाइयों ने अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्सों पर हमले में भाग लिया। आजाद हिंद फौज के सबसे प्रमुख अधिकारियों में से एक, शाह नवाज खान के अनुसार, भारत में प्रवेश करने वाले सैनिक जमीन पर लेट गए और पूरी भावना के साथ अपनी मातृभूमि की पवित्र मिट्टी को चूमा। बोस को अपने देश से बेपनाह मोहब्बत थी, कुछ भी कर गुजरने को चौबीसों घंटे तैयार रहते थे। इसलिए उनके तमाम प्रेरक प्रसंग आज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं।

- डॉ. रमेश ठाकुर

सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

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