By अभिनय आकाश | Oct 28, 2026
इजरायल चुनाव में कांटे की टक्कर है। अरब पार्टियों के हाथ में सत्ता की चाबी जा सकती है क्या? इजराइल में चुनाव संपन्न हो चुके हैं। वोटों की गिनती जारी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है कि क्या बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे या इस बार उनकी सत्ता का खेल खत्म होने वाला है। चुनावी तस्वीर ऐसी बन रही जहां ना तो नेतन्याहू का खेमा बहुमत के आंकड़े तक पहुंच पा रहा और ना ही उनके विरोधी आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। कहीं 51 बनाम 51 का मुकाबला है तो कहीं नेतन्याहू का गठबंधन 55 सीटों पर आगे दिखाई दे रहा। लेकिन सरकार बनाने के लिए चाहिए 61 सीटें। सबसे दिलचस्प बात यह है कि अगर दोनों बड़े खेमे बहुमत से दूर रह जाते हैं तो सत्ता की चाबी उन अरब पार्टियों के हाथ में जा सकती है जिनके समर्थन को लेकर इजराइल की राजनीति में पहले से ही गहरा विवाद रहा है। अब सवाल है कि क्या नेतन्याहू अपने राजनीतिक अनुभव के दम पर फिर से बाजी पलट देंगे? क्या विपक्ष उन्हें सत्ता से बाहर कर पाएगा या फिर इजराइल को एक बार फिर चुनाव की तरफ जाना पड़ेगा। चलिए इस पूरे चुनावी गणित को समझते हैं। चुनावी नतीजों में आखिर चल क्या रहा?
सबसे पहले बात करते हैं चुनावी आंकड़ों की। इजराइल की संसद का नाम है नेसेट। इसमें कुल 120 सीटें हैं। यानी सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। लेकिन फिलहाल चुनावी तस्वीरों में यही आंकड़ा सबसे बड़ी पहेली बना हुआ है। इजराइल के सरकारी प्रसारक कान 11 के अपडेटेड एग्जिट पोल में नेतन्याहू समर्थक खेमे और उनके विरोधी खेमे दोनों को 51-51 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं चैनल 12 के अनुमान में नेतन्याहू के गठबंधन को 50 और विपक्षी खेमे को 52 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। दूसरी तरफ डायरेक्ट पोल्स के अनुमान में नितनया ब्लॉक को 55 सीटें, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली विपक्षी ब्लॉक को 49 सीटें और अरब पार्टियों को 16 सीटें मिलने की संभावना जाहिर की गई। जबकि एक अन्य पोल में नेतन्याहू समर्थक दलों को 60 सीटों तक पहुंचते हुए दिखाया गया है। यानी अलग-अलग अनुमानों में अंतर जरूर है लेकिन सबसे अहम बात एक ही है कि किसी भी खेमे के लिए बहुमत का आंकड़ा आसानी से हासिल होता नहीं दिख रहा। हालांकि यहां पर एक बात समझना जरूरी है। एग्जिट पोल और शुरुआती सीट अनुमानों को अंतिम चुनाव परिणाम नहीं माना जाता लेकिन उससे झलक मिल जाती है। वोटों की गिनती पूरी होने और आधिकारिक नतीजे आने तक तस्वीर बदल सकती है। इसीलिए फिलहाल किसी की जीत या हार का अंतिम ऐलान करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि नेतन्याहू के लिए चुनाव बेहद अहम बन गया है।
इजराइल के विपक्ष में कई तरह की राजनीतिक विचारधाराओं वाले दल शामिल हैं। ऐसे में उन्हें सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि सरकार चलाने के लिए भी आपसी सहमति बनानी होगी। दूसरी तरफ नेतन्याहू के पास भी अपने पुराने सहयोगियों का समर्थन जुटाने का अनुभव है। इसलिए मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं असली लड़ाई इस बात की है कि कौन अलग-अलग दलों को एक मंच पर लाकर 61 सांसदों का समर्थन हासिल कर सकता है। यहीं से शुरू होता है इजराइल की राजनीति का सबसे दिलचस्प खेल। अरब पार्टियां बन सकती हैं किंग मेकर। इस पूरे चुनाव में सबसे अहम भूमिका उन अरब पार्टियों की हो सकती है जिनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या को प्रभावित करने की क्षमता है। अब इसे आसान भाषा में समझिए। मान लीजिए नेतन्याहू के गठबंधन को 55 सीटें मिलती हैं। बहुमत के लिए उसे उन्हें छह और सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी। दूसरी तरफ अगर विपक्ष को 49 से 51 सीटें मिलती हैं तो उसे भी बहुमत तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना पड़ेगा। अब ऐसी स्थिति में छोटी पार्टियां और अरब राजनीतिक दल सरकार बनाने के समीकरण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
इस चुनाव की चर्चा सिर्फ इजराइल तक सीमित नहीं है। अमेरिका की राजनीति से भी इसके इसे जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नेतन्याहू की चुनावी स्थिति को लेकर प्रतिक्रिया दी। उनकी संभावनाओं में सुधार का श्रेय अपने समर्थन को दिया। ट्रंप के दावे के मुताबिक पहले नेतन्याहू के हार की संभावना जताई जा रही थी। लेकिन बाद में मुकाबला काफी करीबी हो गया। हालांकि यहां एक समझना जरूरी है कि यह ट्रंप का राजनीतिक दावा है जो अक्सर कुछ भी करते रहते हैं। इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि नितनया की चुनावी स्थिति में बदलाव की वजह अमेरिकी समर्थन या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन ही था। अभी कुछ दिन पहले से ही बात है जब इजारइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात की थी। दोनों नेताओं के बीच पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा हुई और इस इलाके में शांति और स्थिरता बहाल करने पर जोर दिया गया। साथ ही दोनों देशों के बीच 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दोहराया था।