विपक्षी प्रत्याशी भले कमजोर लग रहे हों, लेकिन केजरीवाल को मिलेगी तगड़ी टक्कर

By संतोष पाठक | Jan 22, 2020

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तीसरी बार नई दिल्ली विधानसभा सीट से विधायक का चुनाव लड़ रहे हैं। दिल्ली में आप सरकार को सत्ता से बाहर करने का दावा करने वाली भाजपा की तरफ से यह लगातार कहा जा रहा था कि वो केजरीवाल के खिलाफ इस बार मजबूत उम्मीदवार उतारेंगे। 2015 के विधानसभा चुनाव में 70 में से एक भी सीट नहीं जीत पाने वाली कांग्रेस का भी इस बार यही दावा था। दोनों ही दल केजरीवाल को उनके ही क्षेत्र नई दिल्ली विधानसभा सीट पर घेरने की बड़ी रणनीति बनाने का दावा कर रहे थे।

 

मजबूत उम्मीदवार कौन होता है ?

केजरीवाल के खिलाफ जैसे ही भाजपा और कांग्रेस ने मजबूत उम्मीदवार खड़ा करने की बात कही तो राजनीतिक हवा को देखते हुए यह माना जाने लगा कि किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती या फिल्मी कलाकार को केजरीवाल के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा जाएगा। भाजपा की तरफ से कभी कुमार विश्वास को तो कभी सपना चौधरी को खड़ा करने की खबरें उड़ती रहीं। लुटियन जोन में चल रही अफवाहों में सुषमा स्वराज की बेटी का नाम भी आया तो विजय गोयल से लेकर कई बड़े नेताओं को भी चुनाव लड़ाने की खबरें तैरती रहीं। वहीं कांग्रेस की तरफ से कभी शीला दीक्षित की बेटी तो कभी उनकी बहन का नाम राजनीतिक गलियारे में उड़ता सुनाई दिया। ऐसे में जब फाइनली दोनों पार्टी के उम्मीदवारों के नाम सामने आए तो यह कहा जाने लगा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही कमजोर उम्मीदवार उतार कर केजरीवाल को वॉकओवर दे दिया है। खासतौर से आम आदमी पार्टी लगातार इसे फैलाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। उम्मीदवारों के बारे में चर्चा करने से पहले आपको इस विधानसभा क्षेत्र का गणित और इतिहास बता देते हैं।

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नई दिल्ली विधानसभा सीट का गणित

नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख 44 हजार के लगभग मतदाता हैं, जो 175 मतदान केंद्रों पर वोटिंग करेंगे। इस इलाके में देश की संसद है, राष्ट्रपति भवन है, सांसदों, मंत्रियों के सरकारी आवास हैं। बड़े से लेकर छोटे सरकारी अधिकारियों का घर है, तो जाहिर सी बात है कि सरकारी कर्मचारी जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। भाजपा यह दावा कर रही है कि केजरीवाल ने जिस तरह का व्यवहार अपने एक आईएएस अधिकारी के साथ किया था, उसके बाद से तमाम सरकारी अधिकारी और कर्मचारी उनसे नाराज चल रहे हैं। देखते हैं कि भाजपा इसे कितना भुना पाती है। इस विधानसभा क्षेत्र में दलित मतदाताओं की संख्या भी 15 फीसदी के लगभग है। इसलिए हमने देखा कि इस बार भी नामांकन के लिए जाते समय रोड शो की शुरूआत केजरीवाल ने मंदिर मार्ग स्थित वाल्मिकी बस्ती से ही की थी। आपको याद होगा कि इसी बस्ती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कुछ साल पहले स्वच्छता अभियान की शुरूआत की थी।

  

नई दिल्ली विधानसभा सीट का इतिहास

परिसीमन से पहले इस विधानसभा क्षेत्र को गोल मार्केट के नाम से जाना जाता था। दोबारा से विधानसभा व्यवस्था शुरू होने के बाद 1993 में हुए पहले चुनाव में भाजपा के टिकट पर पूर्व क्रिकेटर और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे कीर्ति झा आजाद यहां से चुनाव जीते थे। इसके बाद 1998 में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को उतारा और शीला दीक्षित ने कीर्ति आजाद को इस सीट से हरा दिया और प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं। 2003 में शीला दीक्षित ने बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर उतरी पूनम आजाद को हराया जो कीर्ति आजाद की पत्नी हैं। 2008 के चुनाव में शीला दीक्षित ने बीजेपी के विजय जॉली को हराया, लेकिन राजनीति की इस दिग्गज खिलाड़ी को 2013 में नये-नये चुनाव में उतरे अरविंद केजरीवाल ने हरा दिया। केजरीवाल इस जीत के बाद उसी कांग्रेस के समर्थन से प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 2015 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने बीजेपी की नुपूर शर्मा को हराते हुए फिर से इस सीट पर जीत दर्ज की। इस बार यानि 2020 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल तीसरी बार इसी सीट से चुनावी मैदान में उतरे हैं।

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इस सीट पर मतदान के ट्रेंड को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जो भी उम्मीदवार 40 हजार के लगभग वोट हासिल कर लेगा उसका जीतना तय है। 2013 में यहां से केजरीवाल को 44,269 और 2015 में 57,213 वोट मिले थे।

  

केजरीवाल को कड़ी टक्कर दे पाएंगे सुनील यादव और रोमेश सभरवाल ?

अब बात उम्मीदवारों की कर लेते हैं कि क्या वाकई भाजपा और कांग्रेस ने कमजोर उम्मीदवारों को उतारा कर केजरीवाल को वॉक ओवर दे दिया है। यह बात बिल्कुल सही है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही लगातार यह दावा कर रही थीं कि इस बार केजरीवाल के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारा जाएगा ताकि उन्हें उनके ही घर में परेशान किया जा सके। यह बात भी सही है कि मजबूत उम्मीदवार से हमेशा एक ही मतलब निकाला जाता है। बड़ा...दिग्गज नेता या फिर कोई मशहूर हस्ती बॉलीवुड टाइप। इस मापदंड पर देखा जाए तो निश्चित तौर पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही चूक गए हैं।

 

भाजपा ने यहां से सुनील यादव को चुनावी मैदान में उतारा है। सुनील यादव पार्टी के युवा चेहरे के तौर पर दिल्ली में जाने जाते हैं। दिल्ली प्रदेश युवा मोर्चा के अध्यक्ष हैं और हाल के दिनों में इन्होंने दिल्ली की आप सरकार और कांग्रेस के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन करके अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश की है। पेशे से वकील सुनील यादव लगातार बाहरी बनाम स्थानीय और मुख्यमंत्री बनाम विधायक का मुद्दा उठाकर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। युवाओं में लोकप्रियता के दम पर जीत हासिल करने का दावा करने वाले सुनील को उम्मीद है कि क्षेत्र के दलित और सरकारी कर्मचारी मतदाता कमल निशान पर ही वोट करेंगे।

 

कांग्रेस के टिकट पर यहां से चुनावी मैदान में उतरे रोमेश सभरवाल को भी सरकारी कर्मचारियों (सेवारत और रिटायर) से बड़ी उम्मीदें हैं। छात्र राजनीति से शुरूआत करने वाले रोमेश सभरवाल 40 साल से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं। दिल्ली सरकार के पर्यटन विभाग में निदेशक के पद पर रह चुके हैं। कांग्रेस का दावा है बड़े पैमाने पर सरकारी कर्मचारी इस बार कांग्रेस को वोट करेंगे। यह बात बिल्कुल सही है कि फिलहाल इन तीनों उम्मीदवारों में आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। समीकरण या यूं कहें कि दिल्ली की राजनीतिक हवा तो फिलहाल यही बता रही है कि केजरीवाल की राह इस बार भी नई दिल्ली सीट से आसान है। ऐसे में भले ही भाजपा के सुनील यादव बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे को उठाते रहें या फिर कांग्रेस के रोमेश सभरवाल जमीनी नेता होने का दावा करते रहें लेकिन फिलहाल तो केजरीवाल उन पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।

 

फिलहाल तो यही लग रहा है कि भाजपा और कांग्रेस यहां आपस में इस बात के लिए लड़ रही हैं कि नंबर 2 की पोजिशन पर कौन आएगा। लेकिन चुनाव है और चुनाव तो चुनाव ही होता है। नई दिल्ली सीट से सुनील यादव या रोमेश सभरवाल चुनाव नहीं लड़ रहे हैं बल्कि दोनों की पार्टी भाजपा और कांग्रेस चुनाव लड़ रही हैं। इसलिए इंतजार करते हैं कि किसमें कितना है दम।

 

-संतोष पाठक

 

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