इतिहास रचने के नए अंदाज़ (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 16, 2026

यह भी इतिहास रचना ही है कि अधिकांश युद्ध अनुशासन और शांति स्थापित कर, शांति पुरस्कार हासिल करने के लिए लड़े जा रहे हैं। यह भी ऐतिहासिक है कि वफादारी के प्रतीक जानवर बारे, बड़ी बड़ी कुर्सियां और व्यक्तित्व लगभग लड़ते रहे और खींचतान जारी है। गरमी के मौसम में गरमा गर्म बहस चल रही है। कुछ इंसानी बयान स्थिति इतनी गंभीर कर देते हैं जितनी कुत्तों की गिनती में भी नहीं दिखती। अनेक सन्दर्भों में माफी की मांग भी हुई लेकिन माहौल इतना पारदर्शी है कि कोई किसी से आसानी से माफ़ी मांग कर या माफ़ कर किस्सा खत्म नही करना चाहता। इतने अच्छे या कद्र करने लायक सम्बन्ध नहीं रहे कि माफी मांगने के काबिल हों।  

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कुत्ते आम तौर पर सामान्य व्यक्तियों को ही काटते हैं। आम व्यक्ति तो आम होते हैं उन्हें सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ख़ास व्यक्ति जिन्हें आम तौर पर कुत्ते नहीं काटते, आम लोगों के लिए योजना बना सकते हैं। वैसे कौन सा कुत्ता काटेगा कौन सा नहीं, यह पहले से अंदाज़ा हो तो अलग बात है। किसी को कटवाना हो तो अग्रिम बुकिंग भी करवा सकते हैं। कुत्ते द्वारा काटे जाने की शैली पर उसकी नस्ल के हिसाब से मुआवजा मिल सकता है। भविष्य के लिए टांगों और बाजुओं पर पहने जाने वाले सख्त कवर मिल सकता है। किसी दूसरी जगह काट ले तो ऑटो बीमा स्कीम में मेडिकल बिल का भुगतान सरकार चाहे तो करे । जिस क्षेत्र में कुत्ते ज्यादा हों वहां एंटीरेबीज़ इंजेक्शन लगवाना ज़रूरी हो। कुत्ते के गले में उसका और उसके मालिक का पूरा लेमीनेट हुआ परिचय कार्ड लटका हो ताकि सम्पर्क करने में सुविधा हो । उसमें यह भी लिखा हो कि कितनी बार काट चुका है। कुछ कुत्ता स्वामी ऐसे होंगे जिनसे आम व्यक्ति सम्पर्क करने की हिम्मत न कर पाएंगे। कुत्ता लावारिस होगा तो वैसे भी कुछ नहीं हो पाएगा। वही कुत्ता सरकारी अफसर को भी काट ले तो संयुक्त बीमा क्लेम का सुअवसर हो सकता है। 

सुना है पिछले कुछ सालों में कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं। नेता काफी मुखर अशिष्टता का दामन थामे हुए हैं। इंसान ने कुत्तों से सचमुच काटना तो नहीं सीखा लेकिन ज़बान पर लाए शब्दों से तो काट ही रहा है। कहीं पढ़ने में आया कि शांति स्थापित करने वाले देश में पशु आश्रय स्थलों में कुत्ते और बिल्लियों को मार दिया जाता है। हमारे यहां तो ऐसा नहीं हो सकता। यहां आश्रय मिलना और  मारना दोनों व्यावहारिक स्तर पर मुशकिल हैं। लोकतंत्र से वफादारी निभाना आसान नहीं, इस मामले में भी इतिहास रचा जा रहा है।

- संतोष उत्सुक

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