By संतोष उत्सुक | Jan 01, 2025
नए साल का नैतिक कर्तव्य है कि समाज को हर काम बेहतर करने के लिए प्रेरित करे। इंसान तो संकल्प लेने और न ले सकने के बीच उलझा रह जाता है और नया साल पुराना होने लगता है। बिना लिए संकल्प उदास हो जाते हैं। नए साल के कुछ संकल्प रहित दिन बीत जाने के बाद, एक संजीदा सुबह अदरक, तुलसी व काली मिर्च के छौंक से बनी गर्मागर्म चाय पीकर विचार आया कि कुछ दिन बीत गए तो क्या हुआ। संकल्प तो जब चाहे ले लो। यह दिन रविवार हो तो सोने पर खूब सारा सुहागा। मौसम के आंगन में जब ठंड और धुंध ने धूप को गिरफ्तार कर रखा हो तो कमरे में बीत रही छुट्टी के आरामदायक लम्हों में संकल्प लेने का शांत माहौल स्वत बन जाता है।
संतुष्टि की बात यह है कि हम दूसरों को सुधारने के संकल्प ज़्यादा लेते हैं। वह अलग बात है कि दूसरों को सुधारने का संकल्प हवा में लच्छा परांठा बनाने जैसा है। अनुभव से लबरेज़, स्वादिष्ट एवं नई व्यावहारिक खोज यह है कि संकल्प न लेना भी एक स्पष्ट, सुरक्षित संकल्प लेने जैसा ही है। सर्वश्रेष्ठ इतिहास के अनुसार यह वर्ल्ड ट्रेंड है कि कुछ दिन बाद ही अधिकांश नए संकल्प ढीले पड़ जाते हैं और अप्रैल आते आते उन्हें सांस चढ़ जाता है, कुछ की टांग टूट जाती है। इससे बेहतर है अपने पुराने संकल्प के साथ ही प्यार से चिपके रहो। कम से कम इस बहाने आत्मसम्मान टिका रहेगा और अपनी नज़र में इज्ज़त भी बनी रहेगी।
प्रशंसनीय यह रहेगा कि नए साल के बारह महीने भी नाराज़ नहीं होंगे, उन्हें बेकार के वायदे जो नहीं झेलने पड़ेंगे। तो आइए आज के ऐतिहासिक दिन यह संकल्प लें कि हमने पुराने होते जा रहे नए बरस में, कोई संकल्प किसी भी कीमत पर नहीं झेलना है।
- संतोष उत्सुक