साल 2019 की तो हो गई विदाई पर चुनौतियां भरा रहेगा नया साल

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Dec 31, 2019

साल 2019 की विदाई के साथ ही नए साल 2020 का स्वागत। 31 दिसम्बर की रात 12 बजे नए साल की हेप्पी न्यू ईयर के शब्द घोष के साथ नए साल का आगाज हो गया है। हांलाकि सोशियल मीडिया पर मजाक में ही सही पर दो हजार बीस को ट्वंटी ट्ंवटी कहकर पुकारा जा रहा है। माना जा रहा है कि 2020 ट्ंवटी ट्ंवटी की ही तरह रहेगा। राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में उथल−पुथल भरे 2019 की कड़वी मीठी यादों को भुलाकर हमारे सामने नए साल में नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने का अवसर आया है। देशवासियों की राजनीतिक परिपक्वता को इसी से समझा जा सकता है कि साल के शुरुआत में लोकसभा चुनावों का साया होने और इसके ठीक पहले तीन राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के बावजूद मई में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा और नरेन्द्र मोदी को अपार जन समर्थन मिला। तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि साल के अंत होते होते हरियाणा में जैसे तैसे भाजपा की सरकार बन पाई तो महाराष्ट्र व झारखण्ड में कांग्रेस गठबंधन की सरकारें बन गई। यही तो लोकतंत्र की ताकत है कि जनता कब किसकी सरकार बना दे, कब किस पर मेहरबान हो जाए यह कहा नहीं जा सकता। राज्यों में सिमटती भाजपा के सामने नए साल में बिहार व पश्चिमी बंगाल बड़ी चुनौती होंगी तो अपने सहायोगियों को बांधें रखना भी बड़ी समस्या ही मानी जानी चाहिए। 

 

हांलाकि 2019 कश्मीर में 370 की विदाई, सीएए, पीएनआर और एनआरसी के रुप में याद किया जाएगा। सीएए, पीएनआर और एनआरसी के चलते आज सारे देश में उबाल आया हुआ है। पक्ष विपक्ष में जनता के सामने विरोध व समर्थन का दौर चल रहा है। हांलाकि इस आंदोलन के चलते एक नई दिशा अवश्य मिली है और वह राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में शांति मार्च तो न्यायालय द्वारा पहले हिंसा रोकने का निर्देश और उत्तरप्रदेश में हिंसा फैलाने वालों से नुकसान की भरपाई और कर्नाटक में उपद्रव में शामिल मृतकों को सहायता राशि नहीं देने का निर्णय, ऐसे निर्णय है जो प्रदर्शनों के दौरान हिंसा फैलाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए सावचेत करने को काफी होना चाहिए। 

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इसमें कोई दो राय नहीं की 2018 की तरह ही 2019 को भी विदेशी मामलों में सफल कहा जा सकता है। कश्मीर मुद्दे पर दुनिया के देशों द्वारा पाकिस्तान को समर्थन नहीं दिया जाना इसका सीधा-सीधा संकेत है। हमारी विदेश नीति का ही परिणाम है कि भारत के निर्णयों के खिलाफ कोई देश मुखर आवाज नहीं उठा पाएं हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि विदेशों में भारत की पैठ बनी है। हांलाकि आर्थिक मामलों में देश के सामने गंभीर चुनौतियां है। देश की विकास दर निचले स्तर पर आ गई है तो सुधारात्मक प्रयासों के बावजूद अभी आर्थिक हालातों के सुधार के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं। कल कारखानों में उत्पादन कम हुआ है तो रोजगार के अवसर कम होने से युवाओं में भी निराशा है। नोटबंदी और जीएसटी से अभी कारोबारी उभर नहीं पाए हैं। बाजार में पैसे का फ्लो कम होने से मंदी का दौर जारी है। हांलाकि यह विश्वव्यापी मंदी का दौर है। पर यह कहने से काम नहीं चल सकता और सरकार को आर्थिक मोर्चो पर कड़ा संघर्ष व सुधारवादी और कारोबारियों में आशा का संचार करने वाली नीति बनानी होगी। कारोबारियों में विश्वास जगाना होगा।

 

विराट सांस्कृतिक परंपरा के धनी हमारे देश के युवाओं ने सारी दुनिया में अपनी पहचान बनाई है। अमेरिका सहित दुनिया के बहुत से देश हमारे युवाओं के ज्ञान कौशल से घबराने लगे हैं। गाहे−बेगाहे वे हमारे देश के युवाओं के उनके देश में प्रवेश को सीमित करने का प्रयास करते है। हमारे युवाओं की मेहनत, श्रम शक्ति और ज्ञान−कौशल का लोहा मानते हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी मेहनत से देश को आगे ले जाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। दूसरे देशों के सेटेलाइट हम प्रक्षेपित करने लगे हैं।

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बदलते हालातों में कई ऐसे क्षेत्र है जो अपनी जगह बने हुए हैं। केन्द्र व राज्यों की बीच मधुर सामंजस्य व सहभागिता के संबंध दूर की कोड़ी ही दिखते हैं। इसी तरह से संसद व विधान सभाओं में विधायी कार्यों के प्रति अधिक सक्रियता की आवश्यकता अभी महसूस की जा रही है। देश के कई स्थानों पर संवैधानिक संस्थाओं को गंभीरता से नहीं लेने और संवैधानिक पदों के प्रति गंभीरता का अभाव भी अभी किसी चुनौती से कम नहीं हैं। दल बदल आज भी बड़ी समस्या है तो चुनावों में राजनीतिक वादें और मुफ्त में सुविधाएं देने की घोषणाएं लोकतंत्र का मजाक ही उड़ाती है। इसी तरह से लाख प्रयासों के बावजूद कम मतदान गंभीर समस्या है। राजनीतिक मर्यादा की क्षीणता भी अपने आप में गंभीर समस्या होती जा रही है। सबसे ज्यादा चिंता लाख प्रयासों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने में विफल रहना है तो बदलती जीवन शैली के कारण भी लाख समस्याएं उभरती जा रही है। डिप्रेशन का बढ़ता असर और युवाओं द्वारा आत्महत्या आखिर किस और ले जा रही है समाज को यह सोचना होगा। 

 

रात के बाद प्रातःकालीन सूर्य किरणों की आस की तरह नए साल के साथ एक उज्ज्वल पक्ष भी आता है। हम नए साल के साथ सोचने को मजबूर होते हैं गए साल की कमियों को दूर करने की, कुछ नया करने की। समाज में नया और अच्छा करने की। बुराइयों को दूर करने की। विकास की राह पर आगे तक ले जाने की। जो कुछ खोया है, उसे पाने की। सकारात्मक सोच से ही आगे बढ़ पाता है समाज और देश। यह हमारी संस्कृति की विशेषता रही है कि आशा की जोत हमेशा से जगाए रखती है। आशा की जोत के कारण ही हम नए साल का स्वागत के साथ आगाज करते हैं। कुछ अच्छे की सोचते हैं। जो हो गया है उसे भुलाने का प्रयास करते हैं।

 

नए साल का स्वागत।

 

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

 

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