By Neha Mehta | Aug 30, 2026
नेपाल और तिब्बत की सीमा से लगे हिमालयी इलाकों में आई विनाशकारी बाढ़ ने गांवों से लेकर सड़कों और अहम बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर तक को तहस-नहस कर दिया। लेकिन इस प्राकृतिक आपदा के बीच अब एक और मुद्दा चर्चा में है—चीन के कब्जे वाले तिब्बत क्षेत्र से सामने आ रही जानकारी पर कथित नियंत्रण। रिपोर्ट्स के मुताबिक तिब्बत के स्थानीय लोगों ने बाढ़ और भूस्खलन की भयावह तस्वीरें और वीडियो चीनी सोशल मीडिया पर साझा किए थे। इनमें नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट और उसके आसपास हुई तबाही को साफ देखा जा सकता था। हालांकि कुछ वीडियो ऑनलाइन सामने आने के बाद कथित तौर पर हटा दिए गए।
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ऊंचाई वाले हिमालयी इलाके में ग्लेशियर के टूटने के बाद हालात तेजी से बिगड़े। बर्फ, चट्टानों और मलबे के साथ पानी का जबरदस्त बहाव नीचे की ओर आया और नेपाल की ल्हेंदे खोला नदी से होते हुए भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र तक पहुंचा। इस सैलाब ने देखते ही देखते रास्ते में आने वाली संरचनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। नेपाल में गांवों, पुलों और सड़कों के साथ-साथ कई अहम ढांचे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। 29 अगस्त की शाम तक रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में मृतकों की संख्या 675 तक पहुंच गई थी और 2,400 से अधिक लोग लापता थे। इसके मुकाबले चीन की सरकारी मीडिया ने उस समय तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में सिर्फ पांच मौतों की जानकारी दी थी। बाद की चीनी आधिकारिक जानकारी में ग्यिरोंग में सैकड़ों लोगों के लापता होने की बात स्वीकार की गई। इससे आंकड़ों और जमीन पर मौजूद स्थिति को लेकर सवाल और गहरे हो गए।
आपदा के बाद चीनी सरकारी मीडिया का जोर मुख्य रूप से राहत और बचाव अभियान पर रहा। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने बताया कि सेना और आपातकालीन सेवाओं से जुड़े सैकड़ों बचावकर्मियों को प्रभावित क्षेत्र में भेजा गया। हेलीकॉप्टर और अन्य उपकरण भी राहत अभियान में लगाए गए। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक अखबार पीपुल्स डेली ने भी अपनी कवरेज में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बचाव और राहत कार्यों को पूरी ताकत से आगे बढ़ाने के निर्देशों को प्रमुखता दी। यानी चीन की तरफ से जो तस्वीर सामने आई, उसमें बचाव दल, हेलीकॉप्टर, सेना और राहत अभियान केंद्र में रहे। इसके उलट, स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो कथित तौर पर ज्यादा देर ऑनलाइन नहीं टिक पाए। यही अंतर अब चर्चा का विषय है—क्या लोगों को घटनास्थल की स्वतंत्र तस्वीरें देखने का मौका मिल रहा है या फिर उन्हें मुख्य रूप से वही जानकारी मिल रही है जिसे सरकारी तंत्र सामने लाना चाहता है?
इस आपदा का असर भारतीय नागरिकों पर भी पड़ा है। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, सीमा क्षेत्र में कम से कम 320 भारतीय नागरिकों के लापता होने की जानकारी थी, जबकि करीब 400 अन्य लोग चीन की तरफ फंसे हुए थे। भारत ने नेपाल के राहत और बचाव अभियान में हर संभव सहायता देने की बात कही है। ऐसे हालात में प्रभावित लोगों की सही लोकेशन, फंसे हुए लोगों की संख्या और अलग-अलग इलाकों में नुकसान की वास्तविक स्थिति की जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यहीं से स्वतंत्र जानकारी की भूमिका और बड़ी हो जाती है। अगर किसी इलाके में स्थानीय लोगों द्वारा बनाई गई तस्वीरें या वीडियो उपलब्ध हों, तो वे परिवारों, पत्रकारों और बचाव एजेंसियों को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कहां हुआ है।
इंटेलिजेंस विशेषज्ञ और भू-राजनीतिक विश्लेषक आदिल ब्रार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दावा किया कि ग्यिरोंग पोर्ट की तबाही दिखाने वाले कुछ वीडियो थोड़े समय के लिए चीनी सोशल मीडिया पर मौजूद रहे और बाद में हटा दिए गए। उन्होंने नेपाल से सामने आ रही तस्वीरों से इसकी तुलना करते हुए कहा कि नेपाल की तरफ से लोगों द्वारा साझा की गई तस्वीरें और वीडियो लगातार ऑनलाइन दिखाई दे रहे हैं। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने भी चीन पर आपदा से जुड़ी सूचनाओं को नियंत्रित करने का आरोप लगाया। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी स्थिति में सही और समय पर जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचने से मानवीय राहत अभियान प्रभावित हो सकता है। उन्होंने इस मामले की तुलना कोरोना महामारी के शुरुआती दौर से भी की, जब चीन पर जानकारी छिपाने और नियंत्रित करने के आरोप लगे थे। हालांकि, ये विशेषज्ञों के आरोप और टिप्पणियां हैं। वीडियो हटाए जाने के पीछे चीन की ओर से कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने आया है या नहीं, यह अलग सवाल है।
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के कार्यकारी निदेशक रयान फियोरेसी ने न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में कहा कि इस क्षेत्र में सूचना का प्रवाह बड़े पैमाने पर चीनी सरकार के नियंत्रण में है। उनकी चिंता सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि आम लोग सोशल मीडिया पर क्या देख सकते हैं। असली चिंता यह है कि अगर स्थानीय लोगों को नुकसान की जानकारी साझा करने में डर लगे या उनके पोस्ट हटा दिए जाएं, तो बचाव दल और प्रभावित परिवारों तक अहम सूचनाएं पहुंचने में देरी हो सकती है।
यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि चीन के कब्जे वाले तिब्बत में विदेशी पत्रकारों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की पहुंच लंबे समय से काफी सीमित रही है। ऐसे में जब कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आती है, तो घटनास्थल की स्वतंत्र तस्वीरें और प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर उस जानकारी का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक नहीं हो पाता, तो बाहर की दुनिया के सामने घटनाओं की एक अधूरी तस्वीर रह सकती है। और जब बात सैकड़ों लापता लोगों की हो, तो यह सिर्फ मीडिया की स्वतंत्रता का सवाल नहीं रह जाता। इसका सीधा संबंध राहत, बचाव और परिवारों को जानकारी उपलब्ध कराने से जुड़ जाता है।
हालांकि, यहां एक जरूरी फर्क समझना भी अहम है। बाढ़ आने की प्राकृतिक वजह और चीन की सूचना नीति—दोनों को एक ही मुद्दा मानना सही नहीं होगा। फिलहाल ऐसा कोई स्थापित सबूत नहीं है कि चीनी बुनियादी ढांचे या किसी निर्माण गतिविधि ने सीधे तौर पर इस फ्लैश फ्लड को जन्म दिया। चीनी अधिकारियों ने इसके बजाय कहा है कि आपदा की शुरुआत नेपाल की तरफ हुई। चीन के नेपाल स्थित दूतावास ने उन दावों को खारिज किया है, जिनमें कहा गया था कि चीन की तरफ बना कोई प्राकृतिक आपदा-रोधी बांध या संरचना टूटने से नीचे की ओर तबाही हुई। चीनी दूतावास ने ऐसे दावों और चीन द्वारा समय रहते चेतावनी नहीं दिए जाने के आरोपों को 'फेक न्यूज' बताया है। चीन ने यह भी कहा है कि वह नेपाल के साथ मिलकर राहत और बचाव कार्य में सहयोग कर रहा है।
चीन की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी में लगातार राहत और बचाव अभियान को प्रमुखता दी जा रही है। शिन्हुआ के मुताबिक, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की वेस्टर्न थिएटर कमांड से जुड़ी टीम को ग्यिरोंग में राहत अभियान के समन्वय के लिए भेजा गया। सेना, आपातकालीन कर्मचारी, इंजीनियरिंग टीमें और हेलीकॉप्टर राहत कार्य में लगाए गए हैं। साथ ही चीनी सरकारी मीडिया उन दावों का भी जवाब दे रहा है जिनमें चीन की भूमिका या लापरवाही पर सवाल उठाए गए हैं।