हाथरस गैंगरेप की जांच CBI से कराने के लिए NGO ने उच्चतम न्यायालय का किया रुख

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Oct 08, 2020

नयी दिल्ली। एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर हाथरस में दलित लड़की के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले की जांच सीबीआई को स्थानांतरित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। एनजीओ ने हाथरस मामले को लेकर लंबित याचिका में हस्तक्षेप करने और शीर्ष अदालत की सहायता करने का अनुरोध करते हुए कहा कि उसे वैसे पीड़ितों के साथ काम करने का अनुभव है, जिन्हें ताकतवर राज्य द्वारा उन्हें डराया और धमकाया गया। सिटीजन फॉर जस्टिस ऐंड पीस नाम की संस्था ने अपने आवेदन में गवाहों की सुरक्षा, मृतक के अधिकार, नार्को जांच की स्वीकार्यता, लोक प्राधिकारियों के बयान, मौत से पहले दिए बयान और दुष्कर्म के मामलों में फॉरेंसिक एवं अन्य चिकित्सा सबूतों की प्रासंगिकता जैसे पहलुओं को उठाया है। 

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इसमें कहा गया, ‘‘आवेदनकर्ता इसमें मुख्य रूप से इसमें हस्तक्षेप कर रहा है कि क्योंकि मीडिया में ऐसी कई खबरें हैं जो बताती हैं कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस नृशंस अपराध को कमतर करने की कोशिश कर रहे हैं और वास्तव में मामले में पूर्वाग्रह बना रहे हैं।’’ उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस हफ्ते शीर्ष अदालत में अपना हलफनामा दाखिल करके मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश देने का अनुरोध किया है। सरकार ने कहा कि इस मामले में एक निर्दोष जिंदगी चली गई और उच्चतम न्यायालय अपनी निगरानी में केंद्रीय एजेंसी को जांच करने का आदेश दे सकता है।

उल्लेखनीय है कि 19 वर्षीय दलित युवती से 14 सितंबर को अगड़ी जाति के चार पुरुषों ने कथित रूप से सामूहिक दुष्कर्म किया था। पीड़िता की 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। पीड़िता के शव का उसके घर के पास 30 सितंबर को अंतिम संस्कार किया गया। उसके परिवार का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने जल्दबाजी में अंतिम संस्कार कराया। हालांकि, स्थानीय पुलिस का दावा है कि परिवार की इच्छा के अनुरूप अंतिम संस्कार किया गया। एनजीओ ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से जुड़ी खबर है, जिसमें उन्होंने पीड़िता से बलात्कार नहीं होने का दावा किया था। याचिका में कहा गया, ‘‘यह चिंताजनक है कि इस स्तर का अधिकारी सार्वजनिक रूप से ऐसा बयान दे रहा है, जबकि मामले की जांच जारी है और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद अंतिम नतीजे आएंगे।’’ 

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याचिका में कहा गया, ‘‘आवेदक इन परिस्थितयों की वजह से हस्तक्षेप कर रहा है क्योंकि उसे ऐसे पीड़ितों के साथ के काम करने का अनुभव है, जिन्हें पूर्व में ताकतवर राज्य द्वारा डराया और धमकाया गया है।’’ एनजीओ ने कहा कि पीड़ित के परिवार की सुरक्षा को लेकर दिन-ब-दिन अनिश्चितता बढ़ती जा रही है खासतौर पर मीडिया में ऐसी खबरें आ रही है कि आरोपी से कथित तौर पर जुड़े सामाजिक रूप से ताकतवर परिवार पीड़ित पक्ष को धमका रहे हैं। याचिका में कहा गया कि बड़ा सवाल गवाहों की सुरक्षा का है, जो इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण है। याचिका में दावा किया गया कि दो अक्टूबर को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि पीड़ित परिवार का पॉलीग्राफ और नार्कों जांच कराई जाएगी। इसमें आरोप लगाया गया है कि अधिकारी ने कहा कि पुलिस अधिकारियों और मामले से जुड़े लोगों के साथ-साथ आरोपियों और पीड़ित दोनों की जांच कराई जाएगी।

याचिका में कहा गया कि परिवार के सदस्यों की इस तरह की जांच के लिये कहना कानून का बेजा इस्तेमाल है क्योंकि वे मामले में न तो आरोपी हैं और न ही उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज है। याचिका में कहा गया कि मामले की जांच सीबीआई को इस शर्त के साथ स्थानांतरित करनी चाहिए कि वह उच्चतम न्यायालय को प्रगति रिपोर्ट जमा करेगी। एनजीओ ने सभी गवाहों की सुरक्षा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों से कराने और पीड़िता के शव को आधी रात को दाह संस्कार कराने की परिस्थितियों की जांच के लिए शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया। गौरतलब है कि छह अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय ने हाथरस मामले की सुनवाई करते हुए घटना को ‘स्तब्ध’ करने वाला और ‘भयावह’ करार देते हुए कहा था कि वह सुनिश्चित करेगा कि ‘सुचारु’ जांच हो। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से आठ अक्टूबर तक जवाब मांगा था कि मामले में गवाहों की सुरक्षा कैसे की जा रही है।

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