सरल भाषा के शायर और गीतकार थे निदा फाजली

By प्रज्ञा पाण्डेय | Oct 12, 2019

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, अहिस्ता-अहिस्ता फिल्म का यह गाना हर किसी के दिल को छू जाता है। क्या आप जानते हैं कि इस खूबसूरत गीत को निदा फाजली ने लिखा है, तो आइए हम आपको निदा फाजली के जन्मदिन पर उनके बारे में कुछ रोचक बातें बताते हैं।

निदा फाजली का जन्म दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम मुर्तुज़ा हसन और मां का नाम जमील फ़ातिमा था। निदा फाजली अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। दिल्ली कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड के मुताबिक इनका जन्म 12 अक्टूबर 1938 में हुआ था। इनके पिता खुद भी अच्छे शायर थे। निदा का बचपन ग्वालियर में गुजारा था और उनकी प्रारम्भिक ग्वालियर के ही एक स्कूल में हुई थी। इसके प्रारम्भिक शिक्षा पूरी के बाद उन्होंने 1958 में ग्वालियर कॉलेज (लक्ष्मीबाई कॉलेज या विक्टोरिया कॉलेज) से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। 

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निदा फाजली का वास्तविक नाम मुक़्तदा हसन था। लेकिन वह निदा फ़ाज़ली के नाम से लिखते थे। अपनी सभी कृतियां उन्होंने इसी नाम से की। निदा फाजली में निदा शब्द का मतलब है ‘आवाज़’। जो उनके नाम के साथ सार्थक होता है। फाजिली शब्द क़श्मीर के एक इलाके फाजिल से आया है क्योंकि निदा फाजिली के पुरखे वहीं से दिल्ली आए थे। इसलिए बाद में उन्होंने अपने नाम में फाजली जोड़ लिया। उसी दौरान हिन्दू-मुसलमानों के दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान में जाकर बस गए, लेकिन निदा फाजली भारत में रह गए। 

उस समय रोजी-रोटी की तलाश में कई शहरों में भटके। बम्बई (मुंबई) से उस दौरान हिन्दी/ उर्दू साहित्य की गई सम्मानित पत्रिकाएं निकल रहीं थीं। वहां से धर्मयुग/ सारिका जैसी लोकप्रिय पत्रिकाएं छप रही थीं। निदा साहब भी वहां चले गए और 1964 में धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (Blitz) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में लिखने लगे। उनकी सरल और प्रभावकारी लेखनशैली ने जल्दी ही उन्हें सम्मान दिलाया। उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में प्रकाशित हुआ।

निदा फाजली की कृतियों की ख़ास बात यह है कि उसे समझने के लिए आपको उर्दू की अधिक जानकारी होना जरूरी नहीं है। उनकी रचनाएं आम इंसान को भी आसानी से समझ में आ जाती हैं। 

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पुरस्कार 

निदा फाजली बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्हें उनकी कृतियों हेतु कई पुरस्कार दिए गए। 1998 उनकी रचना खोया हुआ सा कुछ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। फिल्म सुर के लिए 2003 में उन्हें स्टार स्क्रीन पुरस्कार दिया गया। उनकी आत्मकथा रुपी उपन्यास दीवारों के बीच के लिए उन्हें मध्यप्रदेश सरकार का मीर तकी मीर पुरस्कार मिला। साथ ही खुसरो सम्मान भी मिला। यहीं नहीं उर्दू साहित्य हेतु महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार मिला।

इसके अलावा उर्दू और हिन्दी साहित्य के लिए हिन्दी उर्दू संगम पुरस्कार प्रदान किया गया। यही नहीं मारवाड़ कला संगम (जोधपुर), कला संगम (लुधियाना) और पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

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रचनाएं

निदा फालजी ने कुछ बेहद मशहूर फिल्मी गीत लिखे। इसके अलावा मोर नाच, सफर में धूप तो होगी, लफ्जों के फूल, आंखों भर आकाश और आंख और ख्वाब के दरमियां प्रमुख काव्य संग्रह रहे हैं। साथ ही उन्होंने कुछ आत्म कथा भी लिखी उनमें निदा फाजली, दीवारों के बाहर और दीवारों के बीच प्रमुख थीं। तमाशा मेरे आगे, सफर में धूप तो होगी और मुलाकातें इनके प्रमुख संस्मरण रहे हैं।

प्रज्ञा पाण्डेय

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