Niva Bupa ने Max Hospitals में Cashless Treatment सुविधा बंद की, मरीजों को इलाज से पहले जेब से भरना होगा पैसा

By नीरज कुमार दुबे | Sep 02, 2025

वैसे तो भारत का स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन सामने आए एक घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच समझौते की खींचतान का सबसे बड़ा खामियाजा आम मरीजों को भुगतना पड़ता है। हम आपको बता दें कि 16 अगस्त 2025 से निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस ने देशभर के सभी मैक्स हॉस्पिटल्स में कैशलेस इलाज की सुविधा निलंबित कर दी है। यह कदम तब उठाया गया जब दोनों पक्ष टैरिफ संशोधन पर सहमति नहीं बना पाए। कंपनी की ओर से कहा गया कि यह केवल “प्रशासनिक और प्रक्रिया संबंधी चुनौतियों” के कारण हुआ, जबकि मैक्स हेल्थकेयर का आरोप है कि निवा बूपा लगातार दाम घटाने का दबाव बना रहा था, जबकि वर्तमान दरें पहले से ही 2022 स्तर पर थीं। हम आपको बता दें कि 1 सितंबर 2025 को निवा बूपा ने अपनी वेबसाइट से मैक्स हॉस्पिटल्स को नेटवर्क हॉस्पिटल्स की सूची से हटा दिया है, लेकिन पॉलिसीधारकों को इसकी कोई आधिकारिक जानकारी न तो वेबसाइट पर दी गई और न ही सोशल मीडिया पर।

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मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मैक्स हेल्थकेयर के प्रवक्ता ने बताया है कि हमने मई 2025 में अनुबंध समाप्त होने के बाद भी निवा बूपा पॉलिसीधारकों के लिए कैशलेस सुविधा जारी रखी थी। लेकिन निवा बूपा अब हमसे और अधिक टैरिफ कम करने को कह रहा है, जबकि दरें पहले से ही 2022 स्तर पर हैं। हम मानते हैं कि और कमी करना व्यावहारिक नहीं है और इससे मरीजों की सुरक्षा व उपचार की गुणवत्ता प्रभावित होगी। मरीजों की मदद के लिए हमने एक्सप्रेस डेस्क बनाई है, जिससे वह बीमा कंपनियों से रिम्बर्समेंट का दावा कर सकें और हॉस्पिटल को अग्रिम भुगतान न करना पड़े।

वहीं निवा बूपा के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि काफी विचार-विमर्श और सभी विकल्पों की पड़ताल के बाद हमें मजबूर होकर 16 अगस्त 2025 से पूरे भारत में मैक्स ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स में कैशलेस सुविधा निलंबित करनी पड़ी है। यह कदम प्रशासनिक और प्रक्रिया संबंधी चुनौतियों के कारण उठाना पड़ा है।

अब सवाल उठता है कि इस फैसले के पॉलिसीधारकों के लिए क्या मायने हैं? जवाब यह है कि नोटिफिकेशन में कहा गया है कि भले ही कैशलेस सुविधा उपलब्ध नहीं है, लेकिन इलाज बाधित न हो इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। हम आपको बता दें कि निवा बूपा पॉलिसीधारक देशभर में फैले मैक्स ग्रुप के 22 हॉस्पिटल्स में अपना इलाज जारी रख सकते हैं, लेकिन केवल रिम्बर्समेंट आधार पर। यानी पहले मरीज को बिल अपनी जेब से चुकाना होगा और बाद में निवा बूपा से दावा करना होगा। नोटिफिकेशन में कहा गया है, “यदि आप कैशलेस सेवा की सुविधा चाहते हैं, तो हमारे 10,000+ नेटवर्क हॉस्पिटल्स में से किसी को चुन सकते हैं।”

साथ ही निवा बूपा ने दावा किया है कि उसने मैक्स हॉस्पिटल्स में इलाज करा रहे ग्राहकों के लिए प्राथमिकता रिम्बर्समेंट प्रक्रिया शुरू की है। नोटिफिकेशन में लिखा है कि ग्राहक सीधे हॉस्पिटल को भुगतान कर सकते हैं और उसके बाद हमारे पास रिम्बर्समेंट का दावा कर सकते हैं। हम प्रयास करेंगे कि ऐसे दावों को जल्दी निपटाकर ग्राहकों को उचित राशि समय पर मिले। हालांकि इस प्रक्रिया के विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इसके अलावा, निवा बूपा ने अपने पार्टनर्स से यह भी कहा है कि मैक्स हॉस्पिटल्स में इलाज करा रहे क्रोनिक बीमारियों वाले मरीजों को प्राथमिकता-रिम्बर्समेंट प्रक्रिया की जानकारी दें और जहाँ संभव हो, उन्हें 10,000+ नेटवर्क हॉस्पिटल्स की ओर मार्गदर्शन करें।

वहीं अन्य बीमा कंपनियों की स्थिति को देखें तो इसी वर्ष, केयर हेल्थ इंश्योरेंस ने भी मैक्स हॉस्पिटल्स के साथ कैशलेस सुविधा बंद की थी, लेकिन यह केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित थी। अपनी वेबसाइट पर कंपनी ने लिखा था कि हम किफायती प्रीमियम पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन ग्राहकों के दृष्टिकोण से अस्थिर मांगों के कारण, हमने तुरंत प्रभाव से मैक्स हॉस्पिटल्स–एनसीआर में कैशलेस दावा सेवाएँ बंद कर दी हैं। हालांकि, हमारे 21,600+ नेटवर्क प्रदाताओं में यह सुविधा उपलब्ध है।

हम आपको यह भी बता दें कि निवा बूपा का दावा निपटान अनुपात (Claim Settlement Ratio) 92% है, लेकिन Incurred Claims Ratio मात्र 59.92% है, यानी हर 100 रुपये के दावे पर औसतन 60 रुपये ही चुकाए गए। यह बीमा कंपनी की लाभकारी मंशा और ग्राहक की हानि को उजागर करता है। साथ ही वित्तीय वर्ष 2023-24 में निवा बूपा उन शीर्ष 5 कंपनियों में रही जिसके खिलाफ काउंसिल ऑफ इंश्योरेंस ऑम्बड्समैन को सबसे ज्यादा शिकायतें (1,770) मिलीं।

देखा जाये तो इस विवाद से यह स्पष्ट है कि उपभोक्ताओं को अपनी पॉलिसी लेते समय केवल प्रीमियम की सस्ती दर देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए, बल्कि नेटवर्क हॉस्पिटल्स, दावे निपटान का रिकॉर्ड और पारदर्शिता पर भी ध्यान देना चाहिए। वहीं, बीमा नियामक प्राधिकरण (IRDAI) की जिम्मेदारी है कि वह मरीजों और बीमा कंपनियों के बीच इस तरह के टकराव को समय रहते सुलझाए और पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करे।

बहरहाल, निवा बूपा और मैक्स हेल्थकेयर विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि स्वास्थ्य बीमा केवल सुरक्षा कवच नहीं है, बल्कि उसमें अनुबंध, लाभ और हितों का जटिल संतुलन भी छिपा होता है। जब यह संतुलन टूटता है, तो बीमा कंपनी और अस्पताल दोनों अपनी-अपनी दलीलें रखते हैं, लेकिन मरीज सबसे कमजोर कड़ी साबित होता है। आने वाले समय में यदि नियामकीय हस्तक्षेप और उपभोक्ता जागरूकता नहीं बढ़ी, तो स्वास्थ्य बीमा का भरोसा खोखला हो सकता है।

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