By अभिनय आकाश | Oct 12, 2026
देश की राजधानी दिल्ली में प्रोटेस्ट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी वाले थोड़ा डाउन हुए तो अब कांग्रेस वाले गर्म हो गए। बाराखंभा से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च के जरिए शक्ति प्रदर्शन की कोशिश हुई। बीते तीन दिनों से दिल्ली के प्रदर्शन पर नजर डालें तो दिल्ली पुलिस ने ना लाठी चलाई ना टियर गैस छोड़ी। सिचुएशन को बहुत ही प्रोफेशनल तरीके से हैंडल किया। दिल्ली से 6,565 किलोमीटर दूर पश्चिमी यूरोप के देश में पिछले कई दिनों से अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। फ्रांस से लेकर जर्मनी में भी इसी तरह से प्रोटेस्ट हो रहे हैं। वहां की पुलिस प्रोटेस्ट को कैसे हैंडल करती है? अगर आप देखेंगे तो जंतर-मंतर वाले खुद कांप जाएंगे। जर्मनी से आई कई तस्वीरों में नजर आया कि फ़िलिस्तीन के समर्थन में वहांप्रदर्शन हो रहे हैं। मगर वहां की पुलिस का रुख दिल्ली पुलिस जैसा कतई नहीं दिखा। जर्मन पुलिस ने उपद्रवियों पर रत्ती भर भी रहम नहीं दिखाया। हैरानी की बात यह है कि पश्चिमी देशों में इस कार्रवाई को न तो कोई 'आपातकाल' कहता है और न ही यूएन को मानवाधिकारों का उल्लंघन दिखता है। यही हाल फ्रांस का भी है, जहां शिक्षा व्यवस्था को लेकर पिछले एक महीने से जजों का प्रदर्शन जारी है, जिसे वहां सख्ती से दबाया जा रहा है।
किसी भी पीड़ित को जानलेवा चोट नहीं आई और इस घटना में किसी बच्चे को नुकसान नहीं पहुँचा। खबर है कि पुलिस के आने से पहले स्कूल के एक स्टाफ सदस्य ने छात्र से हथियार छीन लिया और उसे काबू में कर लिया। संदिग्ध को तुरंत हिरासत में ले लिया गया, जबकि अधिकारियों ने एक क्राइसिस सेंटर बनाया और छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक मदद का इंतज़ाम किया। घटना के पीछे का मकसद अभी पता नहीं चला है। ऑबग्ने के मेयर जीन-पियरे स्क्विलारी ने संदिग्ध को एक शांत स्वभाव का छात्र बताया और कहा कि उसके पिता ने हाल ही में शिक्षकों से मिलने का अनुरोध किया था। यह साफ़ नहीं है कि इसमें कोई निजी शिकायत या अनुशासन से जुड़ा विवाद शामिल था या नहीं। पुलिस ने कहा कि इस गोलीबारी का देशव्यापी छात्र विरोध प्रदर्शनों से कोई संबंध होने का सबूत नहीं मिला है, क्योंकि स्कूल पर नाकेबंदी का कोई असर नहीं पड़ा था।