लॉकडाउन के बावजूद पश्चिम बंगाल में नहीं थमे बाल विवाह के मामले, मध्य मार्च से 500 मामले आए सामने

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jun 29, 2020

कोलकाता। कोरोना वायरस की रोकथाम के लिये लागू लॉकडाउन के बावजूद पश्चिम बंगाल में मध्य मार्च से अब तक बाल विवाह के 500 मामले सामने आये हैं। अधिकारियों ने यह जानकारी देते हुये दावा किया है कि अधिकतर मामलों में कम उम्र की लड़कियों की शादी उनके परिजनों ने इसलिए की क्योंकि बंदी की वजह से उनका आय का स्रोत समाप्त हो गया था। अधिकारी ने बताया कि यात्रा एवं आवागमन पर रोक होने के बावजूद पिछले कुछ महीनों में बाल विवाह में कमी नहीं आयी है। हालांकि, पश्चिम बंगाल बालक अधिकार संरक्षण आयोग ने शिकायत मिलने के बाद बाल विवाह के कई मामलों को रूकवाया। 

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आयोग की सलाहकार मोमिता चटर्जी ने सोमवार को बताया कि आयोग के हेल्पडेस्क में इस महीने कम से कम 22 मामले दर्ज किये गये। प्रदेश में बड़े पैमाने पर बाल विवाह की खबरों के बाद एक जून को यह हेल्पडेस्क बनाया गया था। उन्होंने बताया कि कुछ लड़कियों की कम उम्र में ही शादी हो जाती है क्योंकि परिवारों को उनका खर्च वहन करना मुश्किल हो जाता है, जबकि कुछ ऐसी भी लड़कियां हैं जो अपनी पसंद के लड़के से शादी करने के लिये घर से भाग जाती हैं। इसके अलावा, ऐसे वक्त में खास कर संकट के दौर में तस्कर भी हमेशा ग्रामीण क्षेत्रों में घूमते रहते हैं और अपनी मंशा में सफल होने के लिये परिवारों को वे नौकरी और पैसे का लालच देते हैं।

चटर्जी ने बताया कि ऐसे मामलों से निपटने के लिये आयोग चाइल्डलाइन एवं पुलिस के साथ समन्वय के साथ काम कर रहा है। उन्होंने बताया, 20 मार्च से 14 अप्रैल के बीच आयोग में कुल 141 मामले दर्ज किये गये थे, जब लॉकडाउन शुरूआती स्तर पर था। चाइल्डलाइन ने हमें सूचित किया कि 15 अप्रैल से मई के आखिर तक 357 ऐसे मामले सामने आये थे। आयोग की सलाहकार ने बताया, लॉकडाउन के दौरान रिपोर्ट किए गए कुल मामलों की संख्या के समेकित आंकड़े का सत्यापन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि आयोग ने हालांकि ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई करते हुये 85 फीसदी मामलों में विवाह रोक दिया। इनमें से अधिकतर मामले दक्षिण एवं उत्तर 24 परगना तथा पूर्वी एवं पश्चिमी वर्द्धवान के थे। 

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चटर्जी ने कहा कि लॉकडाउन से कई परिवार प्रभावित हुए हैं। इस वजह से उनमें से कई लोग अपनी नाबालिग बेटियों की शादी के लिये मजबूर हुये, क्योंकि इसका मतलब होगा कि खाने वाला एक व्यक्ति कम हो गया। ऐसे वक्त में तस्करी के मामलों में भी उछाल आया। हम लोग माता पिता को मामले के प्रति संवेदनशील बनाने के लिये, स्थानीय प्रशासन, चाइल्डलाइन एवं स्वैच्छिक निकायों के साथ काम कर रहे हैं। चटर्जी ने कहा कि आयोग ने उन बच्चों के लिये एक अन्य हेल्पलाइन स्थापित की है जो लॉकडाउन के बीच मानसिक तनाव, चिंता एवं निराशा के शिकार हुये हैं।

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