हंसना ज़रूरी नहीं (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 06, 2024

दुनिया के महान लोकतंत्र में चुनावी हास्य जारी है और संसार में हर साल मनाया जाने वाला हास्य दिवस भी इसी बीच आ गया। हमारे यहां तो वैसे भी साल भर हंसते खेलते रहने की परम्परा है। ज़िंदगी में हर कुछ होता रहे, हम हंसते, मुस्कुराते, खुश और संतुष्ट रहते हैं। चुनाव के दिनों में, आचार संहिता का अचार डालने की घोषणा हो जाए बस, फिर तो एक दूसरे पर खुलकर हंसना शुरू कर देते हैं। कुछ लोग तो सिर्फ विश्व हास्य दिवस के दिन, हास्य दिवस मनाने के लिए हंसते हैं लेकिन चुनाव के दिनों में जिसको टिकट मिल जाए वह तब तक नकली हंसी हंसता रहता है जब तक हार या जीत न जाए, क्यूंकि जीतने पर वह देश सेवा करके, मेवा प्राप्त करने के लिए संजीदा हो जाता है। 

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बीमार, गरीब, बेरोजगार और बुज़ुर्ग सिर्फ हंसने के सहारे कैसे जी सकते हैं। कहा भी गया है ईर्ष्या, द्वेष, नफरत और स्वार्थ के माहौल में हंसना क्या कर सकता है। चुनाव खत्म होने के बाद तो नेता भी बेशर्मी से हंसते हैं। कहते हैं हंसने से इम्युनिटी बढ़ती है। खाने के लिए दूसरों पर आश्रित रहने वाला व्यक्ति दिल से कैसे हंसेगा। झूठ कहते हैं कि पूरे वर्ष नियमित हंसा जाए तो एक साल में करीब दो किलो वज़न कम हो सकता है। कैसी-कैसी बातें करके वज़न कम करने के दावे करते हैं। कहते हैं हंसने से काम में मन लगता है लेकिन हमारा तन मन धन तो दूसरों पर हंसना चाहता है। दूसरों पर हंसना बहुत ज़रूरी कर्तव्य है हमारा।  

झूठी हंसी हंसने से बेहतर न हंसना है। हंसी तो वही सच्ची और खरी है जिसमें कोई कोशिश शामिल न हो।

- संतोष उत्सुक

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