यूपी में बीजेपी के खिलाफ गठबंधन की कोई नई सूरत नहीं

By संजय सक्सेना | May 30, 2023

लोकसभा के चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय बचा है, लेकिन अभी तक उत्तर प्रदेश में मोदी विरोधी मोर्चा कहीं भी आकार लेता नहीं दिखाई दे रहा है। सभी दलों के नेता अलग-अलग राग अलाप रहे है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी सहित छोटे-छोट दलों तक के नेता अपनी अलग ढपली बजा रहे हैं। विधान परिषद की दो सीटों पर हुए चुनाव को आम चुनाव से पूर्व अंतिम चुनाव माना जा रहा था जिसमें भी विपक्षी एकता कहीं नहीं दिखाई नहीं दी। चुनाव में विपक्ष बीजेपी के खिलाफ पूरी तरह से बिखरा-बिखरा नजरा आया। हालांकि विपक्ष एकजुट हो भी जाता तब भी वह बीजेपी प्रत्याशी की जीत की राह में बाधा नहीं बन सकता था। बीजेपी ने बड़ी आसानी से दोनों सीटों पर अपनी जीत का परचम फहरा दिया। ऐसा लगता है विधान परिषद चुनाव का सारा गणित समझने के बाद भी समाजवादी पार्टी को अपना प्रत्याशी मैदान में उतारना भारी पड़ गया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव को उम्मीद थी कि इन चुनावों में विपक्षी दल उनके साथ खड़े होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ नहीं। उधर, कांग्रेस के 2 विधायकों और बसपा के एक विधायक ने अपना वोट ही नहीं डाला। बीजेपी के प्रत्याशियों को राजा भईया की पार्टी का भी समर्थन मिला है और राजभर की पार्टी ने भी बीजेपी के प्रत्याशी को वोट दिया। इससे लोकसभा चुनाव से पहले हुए विधान परिषद की दो सीटों के उपचुनाव में विपक्ष की एकता को बड़ा झटका लगा है। दोनों ही सीटों पर उम्मीदों के मुताबिक भाजपा ने जीत दर्ज कर ली है। भाजपा के मानवेन्द्र सिंह व पदमसेन चौधरी विजयी हुए हैं।

भाजपा के मानवेन्द्र सिंह को 280 व सपा के रामजतन राजभर को 115 मत मिले हैं। एक मत अवैध हो गया। इसी प्रकार पदमसेन को 279 व सपा के रामकरन निर्मल को 116 मत मिले हैं। इसमें भी एक मत अवैध हुआ है। मानवेन्द्र सिंह बनवारी लाल के निधन से रिक्त हुई सीट पर चुने गए हैं जबकि पदमसेन चौधरी लक्ष्मण प्रसाद आचार्य की सीट से चुने गए हैं।

बहरहाल, विधान परिषद उपचुनाव में वोट का गणित पक्ष में न होने की वजह से सपा को अपने प्रत्याशियों की हार पहले से पता थी। ऐसे में उसके प्रत्याशियों की हार चौकाने वाली नहीं रही। लेकिन जानकार कहते हैं, इस चुनाव के जरिए सपा ने अपने पिछड़े-दलित समीकरण की बिसात पिछले पंद्रह दिन से भाजपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा को करीब एक सप्ताह परिषद चुनाव की मशक्कत में भी उलझा दिया। वहीं कांग्रेस और बसपा के बारे में कहा जा रहा है कि इन दोनों दलों ने सपा और भाजपा से समान दूरी का संकेत देने का प्रयास किया। जानकारों का मानना है कि दोनों दल यूपी में आगे किसी गठबंधन का हिस्सा बनने को लेकर फिलहाल दुविधा की स्थिति में नजर आ रहे हैं। 

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