बचपन को यादगार बनाने वाले नारायण की कहानियों को नहीं भूल सकता कोई, अलग ही चाव के साथ देखा जाता था मालगुडी डेज़

By अनुराग गुप्ता | May 13, 2022

भले ही हम कितने बड़े क्यों न हो गए हों लेकिन जब भी बचपन का जिक्र हमारे आस-पास हो रहा होता है तो हम बड़े चाव के साथ कान लगाकर उन बातों को सुनते हैं। उसी बचपन की सबसे शानदार यादों में से रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी की कहानियां थीं। हां, आप लोग इस नाम से अंजान होंगे और हमारे पुराने साथी भी लेकिन अगर हम रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी को आर के नारायण कहें तो शायद बहुत से लोगों को लघु कथाएं याद आ जाएंगी। जी हां, आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं... हम बात कर रहे हैं बचपन की खट्टी-मीठी यादें देने वाले 'मालगुड़ी डेज' के आर के नारायण की।

आर के नारायण का जन्म 10 अक्टूबर, 1906 को ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रांत में हुआ था। उन्हें भारत में अंग्रेजी साहित्य के सबसे महान उपन्यासकारों में गिना जाता है। हालांकि उन्होंने देश के साथ-साथ विदेशों में भी काफी नाम कमाया है। उनकी किताबें ब्रिटेन और अमेरिका में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। आर के नारायण के पिता एक तमिल अध्यापक थे, जिन्होंने अपना अधिकांश समय मैसूर के शांत शहर में बिताया था। आर के नारायण अपने पिता की राह में आगे बढ़ते हुए कम समय के लिए ही सही लेकिन अध्यापक और पत्रकार के रूप में काम किया था। खैर ये बात अलग है कि उनका झुकाव हमेशा से लेखन कार्यों में रहा है।

आर के नारायण ने एक काल्पनिक शहर मालगुडी को आधार बनाकर कई लघु कथाएं लिखीं। उन्होंने एक दफा कहा था कि अगर मैं कहूं कि मालगुडी दक्षिण भारत में एक कस्बा है तो यह भी अधूरी सच्चाई होगी, क्योंकि मालगुडी के लक्षण दुनिया में हर जगह मिल जाएंगे। 

नारायण का पहला उपन्यास

आर के नारायण का पहला उपन्यास स्वामी और उसके दोस्त (स्वामी एंड फ्रेंड्स) 1935 में प्रकाशित हुआ था और इस उपन्यास ने काफी ज्यादा ख्याती बटोरी थी। उन्होंने इस उपन्यास में मालगुड़ी नामक काल्पनिक कस्बे का जिक्र किया था। जिसको लेकर बाद में भी उन्होंने कई लघु कथाएं लिखीं।

इसके बाद साल 1937 में द बेचलर ऑफ़ आर्टस, 1938 में द डार्क रूम, 1945 में द इंग्लिश टीचर, 1947 में मिस्टर संपथ, 1952 में द फ़ाइनेंशीयल एक्सपर्ट, 1955 में महात्मा का इंतजार, 1958 में द गाइड, 1961 में मालगुडी का आदमखोर, 1967 में द वेंडर ऑफ़ स्वीट्स, 1977 में द पेंटर ऑफ़ साइन्ज़, 1983 में ए टाइगर फ़ॉर मालगुडी, 1986 में टाल्केटिव मेन, 1990 में द वर्ल्ड ऑफ़ नागराज और 1992 में ग्रेन्डमदर्स टेल नामक उपन्यास लिखा था।

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पद्म विभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार और एसी बेन्सन पदक से सम्मानित आर के नारायण ने अपने जीवनकाल में काफी नाम कमाया था। लंबे समय तक मैसूर के यादवगिरि में रहने वाले आर के नारायण 1990 में बीमारी के चलते चेन्नई शिफ्ट हो गए और फिर उन्होंने 13 मई, 2001 को 94 साल की उम्र में मिट्टी के इस शरीर को त्याग दिया। 

मालगुडी डेज़ के 39 एपिसोड हुए प्रसारित

आर के नारायण के लेखन पर आधारित मालगुडी डेज़ पर दूरदर्शन में एक धारावाहिक आता था, जिसे पुराने साथी नहीं भूले होंगे। इसे देखने का लोगों के भीतर अलग ही क्रेज होता था। जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता। इस धारावाहिक को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बनाया गया था और इसके कुल 39 एपिसोड दूरदर्शन पर प्रसारित हुए थे।

- अनुराग गुप्ता

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