By मंगलेश सोनी | Sep 30, 2019
1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन केवल हिंदुओं को घाटी से बाहर करना नही था, बल्कि हिन्दू धर्म को भी कश्मीर घाटी में समाप्त करने के पुरजोर प्रयास हुए। कश्यप ऋषि की धरती, जहां कभी वेदों की ऋचाएं गुंजा करती थीं, 19 जनवरी 1990 का काला दिवस ऐसा आया कि हिंदुओं को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। कथित तौर पर मस्जिदों की मीनारों से घोषणा हो रही थी, अपनी बहन, बच्ची, महिलाएं, धन दौलत छोड़कर चले जाओ, वरना अंजाम बुरा होगा। कई बहनों के शील भंग हुए, कई की इज्जत तार तार हुई, कई बच्चों को तलवारों की नोक पर मौत के घाट उतार दिया गया। कश्मीर घाटी से हिंदुओं का यह विस्थापन इस प्रकार हुआ था।
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गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी की इस योजना ने देशभक्तों का मन प्रसन्न कर दिया। साथ ही कश्मीर के हर आम नागरिक के हित में महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं, जैसे हर गांव से 5-5 लोगों को सरकारी नौकरी दी जाएगी, मन्दिरों के साथ ही बन्द पड़े शिक्षण संस्थान, सिनेमाघर, सार्वजनिक स्थल, पुस्तकालय भी सरकार की सूची में हैं, इससे कश्मीर में आम जनजीवन और बेहतर हो सकेगा, यह आशा है। कश्मीर में अब तक एंटी करप्शन ब्यूरो नहीं था। प्रदेश की सरकारों को हर साल करोड़ों रूपये दिए गए किन्तु वह धन गया कहाँ ? इसकी जांच के लिए प्रदेश में एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो) की स्थापना हुई है। इतना ही नहीं सरकार ने कहा है कि पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारे एजेंडे में शामिल है। जिससे यह साफ होता है कि पाकिस्तान चाहे जितने आतंकी पाले, सेना प्रमुख पाकिस्तान को चेतावनी दे चुके हैं कि यदि पाकिस्तान ने फिर से कोई दुस्साहस किया तो बालाकोट जैसे दृश्य और देखने को मिलेंगे और अबकी बार हमले और भी भीषण होंगे।
भारत सरकार कश्मीर के हर बच्चे के हाथ में कम्प्यूटर और तिरंगा देखना चाहती है, अब यदि कोई तिरंगे का अपमान करता है तो अन्य राज्यों की तरह ही उसे दण्ड दिया जाएगा। जब गृह मंत्री यह संकल्प कर चुके हैं कि पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारा है, जरूरत हुई तो उसके लिए जान भी दे देंगे, ऐसे समय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी की यह घोषणा देश के बढ़ते मनोबल को दर्शाती है। मन्दिरों, विश्वविद्यालय आदि के पुनर्निर्माण से कश्मीर का पर्यटन और अधिक बढ़ेगा। कश्मीरी पंडित भी कश्मीर की खुली हवा में चैन की सांस ले सकेंगे। आजादी के बाद से ही हिन्दू समाज पर बढ़ते अत्याचारों में यह आदेश सुहाने मौसम की तरह है, अब कश्मीरी पंडितों को भी न्याय मिलने की उम्मीद जाग उठी है, उन्हें लगता है कि वे अपने पुराने बागानों में फिर से लौट सकेंगे। परन्तु क्या फिर से उसी इस्लामी उन्माद का डर उनके मन को कचोटता नहीं होगा ? इस डर को निकालने के लिए और भी प्रयास किए जाना जरूरी है। उन्हें स्वयं भी सक्षम होना होगा, घर, जमीन, छोड़ना समस्या का हल नहीं है। संघर्ष और वीरता के संस्कार को धारण करके ही कश्मीरी पंडित पुनः सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे।
-मंगलेश सोनी