By नीरज कुमार दुबे | Sep 17, 2026
तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों दो ऐसे सवालों के बीच खड़ी दिखाई दे रही है, जिनका संबंध केवल सत्ता और चुनाव से नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी मर्यादाओं से है। एक ओर भाषा के सवाल पर राज्य सरकार और केंद्र के बीच टकराव है, तो दूसरी ओर निर्वाचित विधायकों के इस्तीफे और फिर उन्हीं सीटों से उपचुनाव लड़ने की घटनाओं ने जनादेश की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि राजनीति में विचारधारा, जनादेश और जनता के प्रति जवाबदेही का स्थान आखिर कितना बचा है?
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दरअसल, तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि नवोदय विद्यालयों में हिंदी की शिक्षा राज्य की भाषा नीति के विपरीत है और इससे तमिल के मुकाबले हिंदी को बढ़त मिल सकती है। राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने यही आशंका अदालत के सामने रखी। इसके जवाब में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि नवोदय विद्यालय राज्य की नीति के विरुद्ध नहीं हैं और तमिलनाडु केंद्र के किसी कार्यक्रम को केवल इस आधार पर स्वीकार करने से इंकार नहीं कर सकता। हालांकि राज्य ने यह भी दलील दी कि यह नीति ऐच्छिक है और अदालत किसी राज्य को सरकारी नीति लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
हम आपको बता दें कि तमिलनाडु आज भी ऐसा एकमात्र राज्य है, जहां एक भी नवोदय विद्यालय नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण हिंदी थोपे जाने की आशंका रही है। लेकिन इसी बहस के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भाषा की रक्षा का अर्थ किसी दूसरी भाषा के हर अवसर का विरोध करना है? और क्या केंद्र तथा राज्य अपने-अपने राजनीतिक आग्रहों से ऊपर उठकर शिक्षा और विद्यार्थियों के हित में कोई व्यावहारिक रास्ता निकाल सकते हैं? इस मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी।
इसके अलावा, तमिलनाडु की राजनीति का इससे भी अधिक बेचैन करने वाला पक्ष सामने आया है दल-बदल और इस्तीफे के बाद फिर उसी जनता के सामने उम्मीदवार बनकर लौटने के बढ़ते मामलों से। मदुरंथकम और धारापुरम विधानसभा क्षेत्रों में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव इसी सवाल का केंद्र हैं। ये दोनों अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें हैं। इन सीटों पर उपचुनाव अन्नाद्रमुक के विधायकों के. मरगतम कुमारवेल और पी. सत्यबामा के इस्तीफे के बाद आवश्यक हुए। दोनों ने सत्तारुढ़ दल में शामिल होकर उन्हीं सीटों से दोबारा चुनाव लड़ने के लिए नामांकन किया है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने इन उपचुनावों पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, लेकिन सुनवाई के दौरान पीठ की मौखिक टिप्पणियां लोकतंत्र के लिए असहज सवाल छोड़ गईं। न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां लोकतंत्र का मजाक नहीं बननी चाहिए। सवाल उठाया गया कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद कोई विधायक इस्तीफा देकर फिर उसी सीट से उपचुनाव लड़ सकता है या नहीं और जनता के जनादेश का सही उपयोग हुआ या नहीं। अदालत ने इसे जनता का अपमान बनने से रोकने की जरूरत पर जोर दिया।
देखा जाये तो यह मामला केवल दो विधायकों तक सीमित नहीं है। इस्तीफे के कारण त्रिची पूर्व, करूर, विरालिमलाई, पेरुंदुरई, अंबासमुद्रम, मदुरंथकम और धारापुरम सहित कई क्षेत्रों में उपचुनाव की नौबत आई है। याचिकाकर्ता ने निर्वाचन आयोग से ऐसे जनप्रतिनिधियों के लिए चुनावी खर्च की सुरक्षा राशि जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की है, ताकि बिना कानूनी रूप से मान्य बाध्यता के समय से पहले इस्तीफा देने वाले जनप्रतिनिधियों के कारण होने वाला चुनावी खर्च उनसे वसूला जा सके।
यहां तमिलनाडु की राजनीति का पुराना इतिहास भी प्रासंगिक हो जाता है। द्रविड़ राजनीति ने लंबे समय से भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय को राजनीतिक विमर्श का आधार बनाया है। दूसरी ओर राज्य की राजनीति में दलों के बीच निष्ठा बदलने, सत्ता समीकरणों के साथ पाला बदलने और इस्तीफे के बाद फिर चुनावी मैदान में लौटने की घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में आज की घटनाएं केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम नहीं, बल्कि उस बड़े प्रश्न का हिस्सा हैं कि निर्वाचित प्रतिनिधि वास्तव में किसके प्रति जवाबदेह हैं, दल के प्रति, सत्ता के प्रति या मतदाताओं के प्रति?
बहरहाल, तमिलनाडु की मौजूदा घटनाएं एक व्यापक लोकतांत्रिक चुनौती सामने रखती हैं। भाषा पर बहस हो, शिक्षा नीति पर विवाद हो या दल-बदल का प्रश्न हो, राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को यह स्पष्ट करना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। जनादेश लेकर उसे बीच रास्ते में छोड़ देना और फिर उसी जनता से दोबारा वोट मांगना एक ऐसा सवाल है, जिसका अंतिम उत्तर कानून से अधिक लोकतांत्रिक नैतिकता में तलाशना होगा।