एक कवि की प्याज डायरी (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Dec 21, 2019

पिछले दिनों मुझे एक स्वनामधन्य कवि की प्याज-डायरी हाथ लग गई। प्रस्तुत है भावानुवाद सहित उसके कुछ अंश -

एक झलक को झींकता, सारा हिंदुस्तान।।

शहर के गली-गली में फिरने वाले हाथ ठेलों से निकल कर प्याज को मॉल्स, सुपर बाजार, बिग बाजार में बिकते देख कवि बेचैन हो गया है। इसी बेचैनी में उक्त पंक्तियाँ लिख कर कवि सोचता है कि प्याज का अंग्रेजीकरण होने के कारण ही वह आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गई है।

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कॉंदा लॉकर राखियो, ताले सात लगाय। 

धनवानों के बीच तू, नगरसेठ कहलाय।।

अपनी ऊँची कीमतों के कारण प्याज एलीट वर्ग की वस्तुओं में शामिल हो गई है। उसकी इसी विलक्षणता को रेखांकित करते हुए कवि उस व्यक्ति को, जिसके पास कुछ किलो प्याज है, इन पंक्तियों से सचेत करता है और उसे उसकी बढ़ी हुई सामाजिक-हैसियत का अहसास कराता है।

नहीं भाग्य में दाल थी, प्याज़ रही इतराय।

रूखी-सूखी रोटियाँ, डुबो नीर से खाय।।

इन लाइनों में कवि उस गरीब व्यक्ति के दुख से दृवित है जो दाल के अभाव में प्याज के साथ रूखी-सूखी रोटियाँ खाकर खुश रहता था। आजकल किस्मत का मारा बेचारा वही गरीब पानी में डुबोकर रूखी-सूखी रोटियाँ खाकर अपने पेट की आग बुझा रहा है।

होती रूखी रोटियाँ, और परिश्रमी हाथ।

खाते थे सब पेट भर, पाकर तेरा साथ।।

इन पंक्तियों में कवि का छायावादी रूप मुखर हुआ है यानि कि वह जो कहना चाहता है वह प्रथम दृष्ट्या दृष्टिगोचर नहीं होता। परिश्रमी हाथ ऐसी ही परिकल्पना है। रोटियाँ आज भी रूखी हैं लेकिन खाने को प्याज भी पास नहीं है। और तो और हाथों के पास काम भी नहीं है आजकल, बेरोजगार हैं हाथ। इसी विडम्बना को कवि उक्त पंक्तियों में उभारना चाह रहा है।

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हे देवी बाकी अभी, कित्ति और परबाज।

कब छोड़ घर आओगी, ये शाही अंदाज।।

कवि प्याज की उड़ान से चकित है और उड़ने की उसकी काबिलियत पर मुग्ध भी। इसी मुग्धता के वशीभूत कवि प्याज से पूछता है- अभी और कितना ऊपर जाओगी तथा कितने दिनों में अपने ओरीजनल दस-पंद्रह रुपट्टी वाले भाव में वापस आ जाओगी।

दो महीने बीत गए, बुरा बहुत है हाल।

बच्चों ने खाई नहीं, तड़के वाली दाल।।

प्याज की आसमान छूती कीमतों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण कवि ने इस कविता में किया है। कवि का यह कथन कि दो माह से अधिक हुए बच्चों ने प्याज से छुंकी हुई दाल नहीं खाई है, मन को व्यथित कर जाता है।

तुमने तो प्रिय छू लिया, एपल वाला भाव।

बदलोगी पर किस तरह, अपना मूल स्वभाव।।

इस कविता में कवि प्याज की खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में उसे उसकी औकात बताने की कोशिश करता है। वह पुचकारते हुए उसे प्रिय नाम से सम्बोधित करता है और फिर सेव के बराबर कीमतों में बिकने पर चेताता हुआ कहता है कि तुम कुछ भी करो, प्याज ही रहोगी, सेव जैसी नहीं बन पाओगी।

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खोलोगी मुँह जब कभी, देंगे फल दुत्कार।

हम सब्जियाँ ही तुम्हें, देते हरदम प्यार।।

कवि की ये पंक्तियाँ इसके पूर्व वाली कविता का विस्तार हैं। पिछली कविता में कवि ने प्याज के मूल स्वभाव की बात की थी जो स्वभावत: तामसी होता है जिस कारण वह कभी भी फलों जैसी इज्जत नहीं पा सकती। सब्जियों के बीच ही उसकी पूछ परख है, इज्जत है, यह प्याज को समझना चाहिए।

बढ़ती कीमत का यही, भैया एक इलाज।

मंत्राणी खाती नहीं, मत खाओ तुम प्याज।।

प्याज की कीमतें पटिए पर लाने का उपाय सुझाते हुए कवि कहता है- हे मानव ! प्याज की बढ़ती कीमत से दुखी क्यों है। हमारे देश की मंत्राणी जी तक प्याज नहीं खाती तो फिर तू क्यों प्याज के पीछे पड़ा है।

कुछ दिन मत खा प्याज-- सब ठीक हो जाएगा।

-अरुण अर्णव खरे

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