आस्था के मुखौटे में अवसरवादी राजनीति

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Jul 06, 2026

राम मंदिर चढ़ावा अपहार प्रकरण ने हिंदू समाज के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। धर्म शास्त्रों में मंदिर से जुड़ी संपत्ति के लिए ‘देवद्रव्य’ शब्द का प्रयोग मिलता है। इसमें केवल देवताओं के आभूषण ही नहीं, बल्कि भूमि, दान, अनाज, पशुधन और पूजा सामग्री जैसी सभी वस्तुएं शामिल थीं। एक बार समर्पित हो जाने के बाद यह संपत्ति व्यक्तिगत नहीं रह जाती थी, और इसके अपहार को प्राय: केवल आर्थिक अपराध के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इन्हें आस्था और सामाजिक विश्वास पर चोट के रूप में भी समझा जाता है।

देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस को सनातन धर्म, हिंदुओं और राम मंदिर से कितनी चिढ़ है, इसके तमाम प्रमाण हैं। गांधी परिवार ने राम मंदिर निर्माण का कभी समर्थन नहीं किया। कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि राम, सीता, हनुमान और वाल्मीकि काल्पनिक किरदार हैं। तीन तलाक पर सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने इस्लामी कुरीति की तुलना भगवान श्रीराम से की थी। राम मंदिर वाद का निर्णय टालने का हरसंभव प्रयास कांग्रेस ने किया। राम मंदिर के भूमि पूजन पर रोक लगाने के लिए राहुल गांधी के करीबी साकेत गोखले ने याचिका दायर की थी।

कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने अपने 7 नेताओं को इसलिए निष्कासित कर दिया, क्योंकि उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप में ‘जय श्रीराम’ लिखा था। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने जय श्रीराम कहने वालों की तुलना राक्षस से की थी। अमेरिका के रटगर्स विश्वविद्यालय में इतिहास की सहायक प्रोफेसर ऑड्रे ट्रुश्के ने एक ट्वीट में, भगवान राम को महिला से द्वेष करने वाला और असभ्य बताया था। विवादित ट्वीट करने वाली महिला के समर्थन में कांग्रेस पार्टी न सिर्फ ट्वीट किया बल्कि अपने अखबार नेशनल हेराल्ड में एक लेख भी छापा।

1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर पुलिस ने गोलियां चलाई थी। कारसेवकों के रक्त से सरयू का जल लाल हो गया था। अपने विशेष वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए भगवान राम के अपमान और उससे जुड़े मुद्दों पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव की चुप्पी सर्वविदित है।

राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण में उस समय प्रमुख बाधा बने थे, जब रथ लेकर निकले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार किया था। राजद नेता जगदानंद सिंह ने अयोध्या में बन रहे भगवान श्रीराम के मंदिर की जगह को ‘नफरत की जमीन बताकर भगवान श्रीराम का अपमान किया था।

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने कहा था, "जब बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ तो मैंने नानी से पूछा कि नानी अब तो आप बहुत खुश होगे। अब आपके भगवान राम का मंदिर बनेगा। नानी ने कहा कि ना बेटा, मेरा राम किसी की मस्जिद तोड़कर ऐसे मंदिर में नहीं बस सकता।" तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के उद्घोष पर कैसे नाराज होती थी, ये दृश्य देशवासियों ने देखे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के बाद के लंबे कालखंड तक तथाकथित सेक्युलर और तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखा। पिछले एक दशक में हिंदू मानस सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक तौर जाग्रत हुआ है। इसका श्रेय मोदी सरकार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रयासों को जाता है। वहीं तुष्टिकरण की राजनीति के तहत जब भी किसी दल ने सनातन संस्कृति पर अनुचित टिप्पणियां कीं या हिंदू समाज का अहित सोचा, उस समय हिंदू समाज के साथ भाजपा ने उसकी निंदा की और सुदृढ़ पक्ष लिया। इसी कारण उसने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए शुरू किए गए आंदोलन का खुलकर समर्थन किया।

भाजपा विरोधी दल भले ही अपने एजेंडे के तहत हिंदुत्व को कटघरे में खड़ा करते रहे हों, लेकिन भाजपा ने उससे कभी समझौता नहीं किया। राम मंदिर का निर्माण भाजपा के एजेंडे में शामिल रहा। हिंदूवादी संगठनों और भाजपा के प्रयासों, संघर्षों और प्रतिबद्धता के फलस्वरूप अयोध्या में भव्य, राम मंदिर बना है। राम मंदिर का निर्माण करोड़ों हिंदुओं के सहयोग से हुआ है। सरकारी कोष का एक नया पैसा भी मंदिर निर्माण में नहीं लगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ। मंदिर प्रबंधन, व्यवस्था और रोजमर्रा के कामकाज में न भाजपा का कोई दखल और न कोई भूमिका ही है।

चढ़ावा अपहार प्रकरण के बाद केजरीवाल रामलला के दर्शन करने पहुंचे। कांग्रेस के कई नेता रामलला के दर्शनों को आतुर हैं। हालांकि केजरीवाल, कांग्रेस और अन्य नेताओं की अयोध्या आने की टाइमिंग सवाल तो खड़े करती ही है? ये वही लोग हैं जो अयोध्या विवाद को उलझाए रखना चाहते थे। यह वही लोग हैं जो अयोध्या में राम मंदिर के स्थान पर स्कूल, अस्पताल और सर्वधर्म स्थान बनाने की तर्क देते थे। कहते थे, मंदिर बनने से देश का विकास होगा क्या? मंदिर निर्माण में इनका योगदान शून्य है। 27 साल से ज्यादा रामलला टेंट में रहे, तब ये नेता और राजनीतिक दल कहां थे?

चढ़ावा प्रकरण में पॉलिटिकल माइलेज लेने के लिए राम विरोधी मां सीता और लव कुश का मंदिर बनाने और अयोध्या का अनुपम-अनुकरणीय धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने के दावे पेश कर रहे हैं। असल में,  इन्हें भगवान राम, राम मंदिर, हिंदू और सनातन से कोई लेना—देना नहीं है। और न ही इन्हें राम भक्तों की पीड़ा से कोई मतलब है। चढ़ावा अपहार प्रकरण में अखिलेश यादव दुखी होने की बजाय, मजे लेते हुए, व्यंग्य करते हुए दिखते हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी, डिम्पल यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव आदि नेताओं को अब तक राम लला के दर्शन नहीं किये हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि, तथाकथित सेक्युलर वादी और फर्जी नैरेटिव चलाने वालों की राजनीति तेजी से सिमट रही है। हिंदू मानस इनके फर्जी नैरेटिव और प्रोपेगेंडा में अब फंस नहीं रहा। ऐसे में अपनी बची खुची राजनीति बचाने के लिये ये हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। राम मंदिर चढ़ावा अपहार प्रकरण में विपक्ष को राजनीतिक ऑक्सीजन मिलती दिख रही है। इस प्रकरण में भाजपा की छवि धूमिल कर विपक्ष उसके जनाधार और वोट बैंक को प्रभावित करने के सपने देख रहा है। लेकिन इस राजनीति और पैंतरेबाजी के बीच विपक्ष यह भूल जाता है कि हिंदू मानस सुनता सबकी है; वो सबको अवसर भी देता है; सबको आजमाता भी है। लेकिन एक बार  जांचने-परखने और समझने के बाद वो ऐतिहासिक निर्णय लेता है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे हैं।

चढ़ावा अपहार प्रकरण से हिंदू मानस व्यथित है। उसके विश्वास को गहरी ठेस लगी है। लेकिन अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के प्रति उसकी आस्था और श्रद्धा अटूट है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आश्वस्त कर चुके हैं कि दोषी बचेंगे नहीं। जनमानस योगी जी के वचनों पर विश्वास करता है। विशेष जांच दल मामले की जांच कर रहा है। आठ आरोपी जेल में हैं। इस दुखद प्रकरण से सबक लेते हुए ऐसी फूलप्रूफ व्यवस्था होनी चाहिए कि भविष्य में गड़बड़ी की गुंजाइश ने रहे। वहीं हिंदू मानस के विश्वास जो ठेस लगी है, उसकी पुनर्प्रतिष्ठा भी जरूरी है।

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