विपक्ष बंगाल में ममता की जीत तो देख रहा है लेकिन उसे भाजपा का उभार नहीं दिख रहा

By अजय कुमार | May 04, 2021

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही उत्तर प्रदेश में भी सियासी हलचल तेज हो गई है क्योंकि अब बारी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की है। जल्द ही सियासी ‘तोपों’ का मुंह यूपी की तरफ मुड़ सकता है। विपक्ष पश्चिमी बंगाल के नतीजों से उत्साहित है और यूपी के श्रेत्रीय क्षत्रपों को भी लगने लगा है कि ममता बनर्जी की तरह वह भी भाजपा के लिये ‘खतरे की घंटी’ बन सकते हैं। पश्चिम बंगाल के नतीजों का ही असर है कि कुछ सियासतरदार ममता बनर्जी को मोदी के खिलाफ विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। यह वह लोग हैं जो ममता की जीत तो देख रहे हैं, लेकिन इन्हें पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का उभार नहीं दिख रहा है जो पिछले विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वह 80 के करीब पहुंच गई। वैसे ममता के विरोध में कांग्रेस समेत ऐसे दल भी हैं जिन्हें ममता बनर्जी नहीं भाती हैं

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अखिलेश यादव ने टीएमसी और ममता बनर्जी को बधाई देते हुए ट्वीट में लिखा, ‘पश्चिम बंगाल में भाजपा की नफरत की राजनीति को हराने वाली जागरूक जनता, जुझारू सुश्री ममता बनर्जी जी और टीएमसी के समर्पित नेताओं व कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई!’ अखिलेश ने आगे लिखा, ’ये भाजपाइयों के एक महिला पर किए गए अपमानजनक कटाक्ष ’दीदी ओ दीदी’ का जनता द्वारा दिया गया मुंहतोड़ जवाब है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अभी तक ममता की जीत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, वैसे भी मायावती किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से पहले काफी सोचती विचारती हैं। कांग्रेस के लिए जरूर पांच राज्यों के नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं रहे हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में तो वह मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही। वहीं असम में भी कांग्रेस को बैकफुट पर रहना पड़ गया। कांग्रेस को केरल से भी काफी उम्मीद थी, यहां राहुल गांधी ने धुंआधार प्रचार भी किया था, परंतु पूरे केरल की बात तो दूर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र वायनाड की दो विधानसभा सीटों पर भी पार्टी प्रत्याशी जीत नहीं सके। ऐसा क्यों हुआ, इसकी वजह राहुल गांधी पहले ही बात चुके हैं कि वहां के लोगों में उत्तर भारतीयों के मुकाबले राजनैतिक समझ और दूरदर्शिता अधिक होती है।

   

बहरहाल, उम्मीद यही की जा रही है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजे भी अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव पर काफी असर डालेंगे, जो नतीजे आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि गाँव की सरकार बनाने में समाजवादी पार्टी के साथ-साथ भाजपा की भूमिका प्रमुख रहने वाली है। भाजपा ने पंचायत चुनाव में पहली बार अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतारे थे, भाजपा अपने सिंबल पर पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों को उतार कर गाँव के वोटरों के बीच अपनी पैठ की थाह लेना चाहती थी। क्योंकि भाजपा पर हमेश शहरी पार्टी होने का आरोप लगता रहता था, जिसे वह धोना चाहती थी।  

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गौरतलब है कि अगले वर्ष मार्च के मध्य तक नई विधानसभा का गठन होगा, इसके चलते चुनाव प्रक्रिया फरवरी में शुरू हो सकती है। अभी तक तो यही लगता है कि सपा-बसपा और कांग्रेस अलग-अलग यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा और 2019 के लोकसभा चुनाव के समय सपा-बसपा का गठबंधन कोई करिश्मा नहीं कर पाया था। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल के नतीजों से यूपी के क्षेत्रीय क्षत्रपों का खुश होना स्वाभाविक है। इन्हें यूपी में भी ऐसे ही बदलाव होने की उम्मीद दिखाई दे रही है, लेकिन इस हकीकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि यूपी और बंगाल के सियासी हालात काफी अलग हैं।

-अजय कुमार

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