Mata Vaishno Devi Medical College में Muslim Students के दाखिले का हो रहा था विरोध, कॉलेज की मान्यता ही हो गयी रद्द, CM Omar बोले- अच्छा हुआ!

By नीरज कुमार दुबे | Jan 07, 2026

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में स्थित माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज को शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए एमबीबीएस पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति वापस ले ली है। आयोग का यह फैसला औचक निरीक्षण और लगातार मिल रही शिकायतों के बाद लिया गया है। इस निर्णय के साथ ही कॉलेज में हुए दाखिलों पर भी रोक लग गयी है और पहले से प्रवेश पा चुके छात्रों को अन्य मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित किया जाएगा।


रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की निरीक्षण टीम ने कॉलेज में बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक संसाधनों की गंभीर कमी पाई। रिपोर्ट के अनुसार शिक्षण संकाय में भारी कमी है और ट्यूटर डेमोन्सट्रेटर तथा सीनियर रेजिडेंट जैसे आवश्यक पदों पर भी पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं है। अस्पताल से जुड़ी सेवाएं भी निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरीं। ओपीडी में मरीजों की संख्या अपेक्षित स्तर से काफी कम पाई गयी और कई जरूरी विभाग अधूरे या नाम मात्र के पाए गए।

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निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि कॉलेज में आईसीयू सुविधाएं पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं। प्रयोगशालाओं की स्थिति कमजोर है और पुस्तकालय में आवश्यक शैक्षणिक सामग्री की कमी है। आयोग ने इन खामियों को गंभीर मानते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे माहौल में मेडिकल छात्रों को प्रशिक्षण देना न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ भी खिलवाड़ है।


हम आपको यह भी बता दें कि इस कार्रवाई की पृष्ठभूमि में हाल में उठा वह विवाद भी रहा जिसमें कॉलेज के पहले बैच के छात्रों की धार्मिक संरचना को लेकर हंगामा खड़ा हुआ था। कुल पचास छात्रों में बहुसंख्यक छात्रों के मुसलमान होने को लेकर कुछ संगठनों ने आपत्ति जताई थी और विरोध प्रदर्शन किए गए थे। हालांकि कॉलेज प्रशासन ने बार बार कहा कि सभी दाखिले नीट परीक्षा के आधार पर पूरी तरह मेरिट से हुए हैं और इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया।


राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने साफ किया कि उसकी कार्रवाई का आधार न तो कोई राजनीतिक दबाव है और न ही कोई साम्प्रदायिक सवाल। आयोग के अनुसार निर्णय पूरी तरह शैक्षणिक मानकों और निरीक्षण रिपोर्ट पर आधारित है। आयोग ने यह भी कहा कि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रखा जाएगा और उन्हें अन्य मेडिकल कॉलेजों में समायोजित किया जाएगा ताकि उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो।


देखा जाये तो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का यह फैसला एक कड़ा लेकिन जरूरी संदेश है। मेडिकल शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है जहां अधूरे इंतजामों के साथ भविष्य के डॉक्टर तैयार किए जाएं। इस पूरे मामले में एक पहलू यह भी रहा कि बहस को धार्मिक रंग देने की कोशिश की गयी। वैसे सवाल यह नहीं होना चाहिए था कि किस समुदाय के कितने छात्र दाखिल हुए बल्कि यह होना चाहिए था कि कॉलेज मेडिकल शिक्षा के योग्य भी है या नहीं। हम आपको यह भी बता दें कि अभी एक दिन पहले भी इस मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों के दाखिले के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन हुआ था। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के खिलाफ भी नारेबाजी की थी।


हम आपको यह भी बता दें कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा था कि अच्छा होगा कि सभी छात्रों को अन्य किसी मेडिकल कॉलेज में भेज दिया जाये क्योंकि अगर वहां मेरा बच्चा भी पढ़ रहा होता तो उस संस्थान में अपने बच्चे को भेजने पर मुझे भी चिंता होती। उन्होंने कहा कि वह संस्थान मेडिकल कॉलेज चलाने लायक नहीं है उसे बंद कर देना चाहिए और छात्रों को कहीं ओर समायोजित किया जाना चाहिए।

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