हमारी किताब का विमोचन (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jan 20, 2026

जनवरी के महीने में भी कई प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर बर्फ नहीं पड़ी। इस बात का मुझे ज़्यादा ग़म नहीं मुझे तो इस बात की ज़्यादा खुशी है कि मुश्किल से आई मेरी किताब, पुस्तकों के मेले में एक दिन में एक बार नहीं तीन चार बार विमोचित हो रही है। बहुत आनंद आ रहा है । छोटे शहर में रहने वालों को, बढ़िया लोकार्पण की दिक्कत हमेशा रहती है। किताब का विमोचन तो यादगार अवसर होता है, तरीके से होना चाहिए। यह भी क्या विमोचन हुआ कि छुटभैया नेता आए हुए थे, लेखक गया उनके हाथ में किताब पकड़ाई और निबटा दिया । पहले तो किताब लिखना मुश्किल है,  लिख लो तो सम्पादन करना फिर छपवाना मुश्किल और हां, लिखने और छपने से पहले तो पढ़ना भी पड़ता है जो सबसे मुश्किल है। खैर, अब यह सुविधा तो हो गई कि छपवा लो और विमोचन करने वालों की कमी नहीं। 

किसी सही शुभचिंतक ने बेमिसाल राय दी कि जो कुछ यानी कविता, कहानी, लेख और टिप्पणियां लिखी हुई हैं सब को इक्कठा कर संग्रह छपवा देंगे। उन्होंने खुद ही प्रकाशक से बात की और पुस्तक छप गई। उन्होंने ही बताया कि सौ किताबें लिखकर और छपवाकर, समाज का भला करने वाले लेखक से प्रेरणा लेकर, एक किताब के आधा दर्जन विमोचन तो करवा ही सकते हैं। हमने तो अपने भले और प्रसिद्धि के लिए करना है। कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचते रह गए होंगे। अपनी किताब का तो सब संपन्न हो गया। इस उपलक्ष्य में बहुत ज्यादा बिकने वाले भटूरे छोले भी खाए तो पता चला भटूरे छोले भी इतिहास रचने में स्वादिष्ट भूमिका निभाते हैं।

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विमोचन बारे सुझाव देने वाले कहते हैं कि पुस्तक के पहले संस्करण का या एक संस्करण का एक बार ही विमोचन होना चाहिए, नैतिकता भी यही चाहती है। विमोचन बार बार हो तो अच्छा ही लगता है। हमारे पैसों से खरीदी बर्फी या गुलाब जामुन से हो रहा है तो किसी की नैतिकता को ठंड क्यूं लग रही। यह कोई संवैधानिक मामला तो है नहीं कि तर्क ढूंढा जाए। हमारे शुभ चिन्तक और लोकार्पण करने वाले सहर्ष तैयार हैं तो ग्यारह क्या  इक्कीस बार भी करवा सकते हैं। एक दो बार तो बिना मुंह मीठा करवाए ही हो गया क्यूंकि दो मुख्य अतिथि ऐसे मिले जो निजी  चीनी की मिठास से कड़वाहट में थे । 

हमने नकली बुद्धि से असली सहयोग लिया, पत्नी की पुरानी फोटो नए अवतरण में किताब के कवर पर लगा दी, जिससे घर के कोने कोने में खुशी का कालीन बिछ गया। आशा बंधी कुछ किताबें अपनी सखियों को ज़रूर देंगी,  जिसमें से शर्म के मारे दो चार भुगतान भी कर देंगी। इस तरह दूसरे भी प्रेरित होंगे, क्यूंकि यह भी छपता रहता है कि किताब खरीदकर पढनी चाहिए। कई लेखक मेले में जा नहीं पाते लेकिन विमोचन तो हो ही जाता है।  हम तो किताब के बहाने वहां गए भी और विमोचन भी कई बार हो गया । ज़िंदगी में पहली बार साहित्यकारों का मेला और रेला दोनों देखे। विशाल आकर्षक कट आउट्स, लाईटें, कलात्मक अंदाज़ में सजाई किताबें, इतनी शानदार जगह पर मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति की किताब का विमोचन हुआ।  सच मानिए अगले साल तक दूसरी किताब लिख देने और उसका विमोचन ज़्यादा विशाल स्तर पर करवाने की प्रेरणा मिल गई। एक साल बीतने में क्या देर लगती है।    

- संतोष उत्सुक

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