कुछ नहीं बदला है...अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब होता जा रहा है

By ललित गर्ग | Jan 21, 2022

गरीबी-अमीरी के असंतुलन को कम करने की दिशा में काम करने वाली वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने अपनी ताजा आर्थिक असमानता रिपोर्ट में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति देते हुए इसे घातक बताया है। आज देश एवं दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, भारत में भी ऐसी तस्वीर दुनिया की तुलना में अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही है। देश में मानवीय मूल्यों और आर्थिक समानता को हाशिये पर डाल दिया गया है और येन-केन-प्रकारेण धन कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृत्ति के बीज हमारी परंपराओं में रहे हैं या यह बाजार के दबाव का नतीजा है? कहीं शासन-व्यवस्थाएं गरीबी दूर करने का नारा देकर अमीरों को प्रोत्साहन तो नहीं दे रही है? इस तरह की मानसिकता राष्ट्र को कहां ले जाएगी? ये कुछ प्रश्न ऑक्सफैम की आर्थिक असमानता रिपोर्ट के सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण हैं, आम बजट से पूर्व इस रिपोर्ट का आना और उसके तथ्यों पर मंथन जरूरी है।

इस रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है कि पूरे विश्व में आर्थिक असमानता बहुत तेजी से फैल रही है। अमीर बहुत तेजी से ज्यादा अमीर हो रहे हैं। साम्राज्यवाद की पीठ पर सवार पूंजीवाद ने जहां एक ओर अमीरी को बढ़ाया है तो वहीं दूसरी ओर गरीबी भी बढ़ती गई है। यह अमीरी और गरीबी का फासला कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है जिसके परिणामों के रूप में हम आतंकवाद को, नक्सलवाद को, सांप्रदायिकता को, प्रांतीयता को देख सकते हैं, जिनकी निष्पत्तियां समाज में हिंसा, नफरत, द्वेष, लोभ, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में दरारें आदि के रूप में देख सकते हैं। सर्वाधिक प्रभाव पर्यावरणीय असंतुलन एवं प्रदूषण के रूप में उभरा है। चंद हाथों में सिमटी समृद्धि की वजह से बड़े और तथाकथित संपन्न लोग ही नहीं बल्कि देश का एक बड़ा तबका मानवीयता से शून्य अपसंस्कृति का शिकार हो गया है। अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई तब तक नहीं कम होगी, जब तक सरकार की तरफ से इसको लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। असमानता दूर करने के लिए सरकार को गरीबों के लिए विशेष नीतियां अमल में लानी होगी।

वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के सालाना सम्मेलन एवं भारत के आम बजट के आसपास ऑक्सफेम इस तरह की रिपोर्ट जारी कर बताना चाहता है कि भले वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम पूंजीपतियों की वकालत करे, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में बढ़ आर्थिक असमानता को दूर करने का भी होना चाहिए। अमीरी और गरीबी की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी इसलिये भी है कि पिछले दो वर्षों से हम महामारी से गुजर रहे हैं और यह उम्मीद थी कि कम से कम कोरोना काल में गरीबों को ज्यादा मदद दी जाएगी और उनकी आमदनी सुरक्षित रखी जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। आंकड़े यही बता रहे हैं कि महामारी में जिस वर्ग ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया, वह धनाढ्य वर्ग है। उसकी संपत्ति और आमदनी बढ़ी है, जबकि गरीबों का जीना और दुश्वार हो गया है। इसके लिए सरकारों को निचले तबके की आमदनी में इजाफा करने और धनाढ्य तबके से जायज टैक्स वसूलने की कोशिश करनी होगी।

आर्थिक असमानता घटाने का तरीका ही यही है कि मजदूरों को उनकी वाजिब मजदूरी मिले, खेती करने वालों को अपनी उपज का उचित दाम मिले, मजदूरों को खून-पसीने की कमाई मिले और कोई भी इंसान व्यवस्था का लाभ उठाकर जरूरत से ज्यादा अपनी तिजोरी न भर सके। ऐसा होने से समाज में एक विद्रोह पनपेगा, जो हिंसक क्रांति का कारण बनेगा। भारत में सरकार की नीतियां गरीब दूर करने का स्वांग करती है। असलियत में सरकार अमीरों को ही लाभ पहुंचाती है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने टैक्स में छूट देकर देश के पूंजीपति वर्ग को दो लाख करोड़ रुपये की माफी दे दी। मदद की जरूरत धनाढ्यों को नहीं, गरीबों को थी। असंगठित क्षेत्र के लोग थे, जिनको सहायता मिलनी चाहिए थी। मगर वे मुंह ताकते रह गए और मलाई धनाढ्य ले उड़े। सच यही है कि पिछले पांच साल से लोगों की वास्तविक आमदनी नहीं बढ़ी है। मनरेगा की मजदूरी, जो सरकार खुद तय करती है, वह भी बाजार में मिलने वाली मजदूरी से कम है। जबकि इसके बरक्स शेयर बाजार नित नई ऊंचाइयों पर दिखने लगा है। इन सबसे स्वाभाविक तौर पर अमीरी-गरीबी के बीच की खाई बढ़ रही है।

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हमारे देश में जरूरत यह नहीं है कि चंद लोगों के हाथों में ही बहुत सारी पूंजी इकट्ठी हो जाये, पूंजी का वितरण ऐसा होना चाहिए कि विशाल देश के लाखों गांवों को आसानी से उपलब्ध हो सके। लेकिन क्या कारण है कि महात्मा गांधी को पूजने वाले सत्ताशीर्ष का नेतृत्व उनके ट्रस्टीशीप के सिद्धान्त को बड़ी चतुराई से किनारे कर रखा है। यही कारण है कि एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गईं। अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, विलास और स्वार्थ से जोड़ दिया। नई आर्थिक प्रक्रिया को आजादी के बाद दो अर्थों में और बल मिला। एक तो हमारे राष्ट्र का लक्ष्य समग्र मानवीय विकास के स्थान पर आर्थिक विकास रह गया। दूसरा सारे देश में उपभोग का एक ऊंचा स्तर प्राप्त करने की दौड़ शुरू हो गई है। इस प्रक्रिया में सारा समाज ही अर्थ प्रधान हो गया है।

समाज को अर्थ नहीं, जीवन प्रधान बनाना होगा। इसके लिये सरकारों को लंबी अवधि और छोटी अवधि, दोनों के लिए योजनाएं बनानी होंगी। अल्पावधि कार्यक्रमों में जहां असंगठित क्षेत्र को समर्थन देना, उस तक सीधी नकदी पहुंचाना बहुत जरूरी है, मनरेगा जैसी योजनाओं का बजट बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि मजदूर वर्ग तक नकद राशि पहुंचे। हमारे गांवों में एक बड़ा तबका अब भी कृषि पर आधारित है। उन लोगों की आमदनी बढ़ाने के लिए जरूरी है कि उनकी लागत कम की जाए और आय बढ़ाई जाए। दीर्घावधि की योजनाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रोजगार पर खर्च करने की जरूरत है। जबकि सरकारें इन जीवन से जुड़ी सेवाओं को अपने हाथ में रखने की बजाय निजी क्षेत्रों को सौंप रही है, जिससे ये सेवाएं अब व्यवसाय हो गयी है। इस प्रक्रिया में सारी सामाजिक मान्यताओं, मानवीय मूल्यों, मर्यादाओं को ताक पर रखकर कैसे भी धन एकत्र कर लेने को सफलता का मानक माने जाने लगा है जिससे राजनीति, साहित्य, कला, धर्म सभी को पैसे की तराजू पर तोला जाने लगा है। इस प्रवृत्ति के बड़े खतरनाक नतीजे सामने आ रहे हैं। अब तक के देश की आर्थिक नीतियां और विकास का लक्ष्य चंद लोगों की समृद्धि में चार चांद लगाना हो गया है। चंद लोगों के हाथों में समृद्धि को केन्द्रित कर भारत को महाशक्ति बनाने का सपना भी देखा जा रहा है। संभवतः यह महाशक्ति बनाने की बजाय हमें कमजोर राष्ट्र के रूप में आगे धकेलने की तथाकथित कोशिश है।

-ललित गर्ग

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