बुढ़ापे का दर्द (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Dec 28, 2024

गांव के एक पुराने, लेकिन कभी चहल-पहल से भरे घर के बरामदे में दादा जी बैठे थे। उनकी गोद में एक पुरानी डायरी और हाथ में एक कलम। उम्र ने उनके बालों को सफेद और पीठ को थोड़ा झुका दिया था, लेकिन आंखों में अब भी वह चमक थी, जो अनुभव और किस्सों से आती है। घर में चहल-पहल थी—नाती-पोते खेल रहे थे, बहुएं रसोई में थीं, और बेटा काम पर जाने की तैयारी कर रहा था। पर दादा जी उस शोर से कटे हुए थे, जैसे रेडियो के पुराने बैंड पर बजने वाला बेसुरा गाना।

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दोपहर का वक्त था। दादा जी खाने की मेज पर बैठे। प्लेट में पराठा और सब्जी थी, पर टेबल पर दवाइयों की लंबी कतार। बहू ने पूछा, “दादा जी, दवाई ली?” “हां, बहू, सुबह का कैप्सूल लिया, अब पेट वाली गोली लेनी है। शाम को घुटने की दवा लूंगा। और अगर सब ठीक रहा, तो डॉक्टर को दिखाने भी जाऊंगा,” दादा जी ने चुटकी ली। सब हंस पड़े, लेकिन दादा जी मन ही मन बोले, “कभी एक चाय थकान मिटा देती थी, अब चाय के साथ मेडिकल रिपोर्ट लगती है।”

शाम को दादा जी ने सोचा कि नाती-पोतों को अपनी जवानी की कहानी सुनाई जाए। उन्होंने बच्चों को बुलाया, “अमन, कविता, आओ, तुम्हें अपनी शादी के वक्त की एक मजेदार बात सुनाऊं।” अमन ने कहा, “दादा जी, हमारे पास समय नहीं है। अभी गेम खेल रहे हैं।” कविता ने झूठा बहाना बनाया, “दादी बुला रही हैं।” दादा जी चुपचाप अपनी डायरी के पन्ने पलटने लगे। “हमारे सुनाने की चाह बढ़ती जा रही है, और सुनने वाले घटते जा रहे हैं,” उन्होंने मन ही मन कहा।

अगली सुबह दादा जी पार्क में टहलने गए। वहां उन्होंने एक पुराने दोस्त, मिश्रा जी, को देखा। “कैसे हो, मिश्रा जी?” “बस, जैसे सूखे पत्ते—पेड़ से गिरकर किसी कोने में पड़े हैं।” मिश्रा जी ने कहा। “हमारे बच्चे दौड़ रहे हैं, पर हमारे पास बैठने का वक्त नहीं,” दादा जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा। दोनों हंसते हुए बोले, “चलो, चाय पीते हैं। यही हमारा 'टी-20 मैच' है।”

दोपहर में घर के कोने से दादा जी की आवाज़ आई। वह अपनी डायरी में लिख रहे थे। कविता ने झांककर देखा। “दादा जी, आप क्या लिख रहे हो?” “अपनी जिंदगी की कहानी। जब तुम बड़ी होगी, तो इसे पढ़कर मेरी आवाज सुन सकोगी।” कविता पास आई, “दादा जी, क्या मैं आपकी कहानी सुन सकती हूं?” दादा जी का चेहरा खिल उठा। उन्होंने कहानी सुनानी शुरू की, और कविता ने पूरे ध्यान से सुनी। “शायद बुढ़ापा तभी खूबसूरत बनता है, जब कोई तुम्हारी आवाज सुनने को तैयार हो।”

रात को टीवी पर वृद्धाश्रम की एक रिपोर्ट देखी जा रही थी। बहू ने कहा, “आजकल लोग अपने माता-पिता को वहीं छोड़ आते हैं। कितना बुरा लगता है।” दादा जी मुस्कुराए, “बहू, लोग ऐसा सोचते हैं कि ये अच्छा काम है। लेकिन शायद ‘शायद’ ही बुढ़ापे का सबसे बड़ा सहारा है। इसी शब्द से हर दर्द सहा जा सकता है।”

एक दिन दादा जी ने घोषणा की, “कल से मैं योगा क्लास जॉइन कर रहा हूं। शाम को भजन मंडली में गाऊंगा और रात को अपनी डायरी लिखूंगा।” अमन ने चौंकते हुए पूछा, “दादा जी, ये सब क्यों?” “क्योंकि जिंदगी का हर दिन आखिरी नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। अगर बुढ़ापे को हंसकर नहीं जिया, तो जिंदगी का मजा कैसे आएगा?”

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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