सऊदी अरब की मदद के लिए रणभूमि में उतर सकता है पाकिस्तान, युद्ध का दायरा और फैलेगा!

By नीरज कुमार दुबे | Mar 10, 2026

पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात के बीच पाकिस्तान एक बेहद जटिल सामरिक दुविधा में फंस गया है। सऊदी अरब और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने इस्लामाबाद के सामने यह कठिन सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वह अपने पुराने सहयोगी सऊदी अरब के साथ खड़ा होगा या फिर क्षेत्रीय संतुलन बनाये रखने की कोशिश करेगा। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के सऊदी दौरे ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

दरअसल ईरान द्वारा सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाओं के बाद क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए सामरिक रक्षा समझौते की परीक्षा शुरू हो गयी है। इस समझौते के अनुसार यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा देश उसकी सुरक्षा में सहयोग करेगा। इस संकट के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने रियाद में सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से मुलाकात की। इस बैठक में ईरानी हमलों और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर चर्चा की गयी। दोनों देशों ने साझा रक्षा समझौते के तहत संभावित कदमों पर विचार किया।

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यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यदि पाकिस्तान सऊदी अरब का सैन्य समर्थन करता है तो वह सीधे ईरान के साथ टकराव की स्थिति में आ सकता है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पहले से ही अस्थिर है और ऐसे में नया संघर्ष उसके लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

मगर यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब का घनिष्ठ सहयोगी रहा है। सऊदी अरब ने आर्थिक सहायता और तेल आपूर्ति के माध्यम से कई बार पाकिस्तान की मदद की है। दूसरी ओर पाकिस्तान की ईरान के साथ लंबी सीमा लगती है और इन दोनों देशों के बीच भी सुरक्षा और ऊर्जा से जुड़े कई हित हैं। यही कारण है कि अब तक पाकिस्तान ने इस संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचने की कोशिश की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस्लामाबाद खुलकर सऊदी अरब के पक्ष में उतरता है तो इससे ईरान के साथ संबंध गंभीर रूप से बिगड़ सकते हैं और सीमा पर तनाव बढ़ सकता है।

हम आपको बता दें कि इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति भी है। देश में सुन्नी और शिया समुदाय दोनों की बड़ी आबादी है। ईरान शिया बहुल देश है जबकि सऊदी अरब सुन्नी नेतृत्व वाला राष्ट्र है। ऐसे में यदि पाकिस्तान किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करता है तो देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका भी रहेगी। अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में शिया समुदाय के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किये थे और गुस्साई भीड़ ने पाकिस्तान स्थित अमेरिकी मिशन पर हमला भी बोल दिया था। इसके बाद हालात काबू करने के लिये सुरक्षा बलों को कार्रवाई करनी पड़ी थी जिसमें कई लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आयीं। इस घटना ने इस्लामाबाद की चिंता और बढ़ा दी है। पाकिस्तान की सरकार को आशंका है कि यदि वह खुलकर ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के समर्थन में सेना उतारता है तो देश में मौजूद शिया समुदाय भड़क सकता है और आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बिगड़ सकती है। इसी कारण पाकिस्तान की सरकार और सेना अब तक संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करती रही है।

इसके अलावा, पाकिस्तान की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक परमाणु शक्ति है और मुस्लिम देशों में उसकी सेना को काफी प्रभावशाली माना जाता है। यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ सैन्य रूप से जुड़ता है तो इससे पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है। इसके अलावा यह संघर्ष वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल, चीन और रूस जैसे बड़े देशों के हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में पाकिस्तान का कोई भी फैसला केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करेगा।

वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान फिलहाल सीधे युद्ध में शामिल होने से बचने की कोशिश करेगा। लेकिन यदि सऊदी अरब पर हमले बढ़ते हैं और रक्षा समझौते के तहत दबाव बढ़ता है तो इस्लामाबाद के सामने कठिन निर्णय लेने की नौबत आ सकती है। फिलहाल असीम मुनीर की कूटनीतिक सक्रियता इसी संतुलन को साधने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। आने वाले समय में पाकिस्तान का रुख यह तय करेगा कि पश्चिम एशिया का यह संकट कितना व्यापक रूप लेता है।

हालांकि सैन्य इतिहास पर नजर डालें तो पाकिस्तान की सेना आज तक किसी युद्ध में जीत हासिल नहीं कर सकी है। भारत के साथ हुए युद्धों सहित कई सैन्य टकरावों में पाकिस्तान को करारी हार ही मिली है। ऐसे में यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के समर्थन में किसी संघर्ष में उतरता भी है तो उससे युद्ध के व्यापक परिदृश्य में कोई बहुत बड़ा सामरिक बदलाव आने की संभावना कम ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की भागीदारी अधिकतर प्रतीकात्मक या सीमित सैन्य सहयोग तक ही रह सकती है, जबकि संघर्ष की दिशा मुख्य रूप से क्षेत्रीय महाशक्तियों की रणनीति से ही तय होगी।

-नीरज कुमार दुबे

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