By नीरज कुमार दुबे | Sep 16, 2026
बड़ी-बड़ी कूटनीतिक बातें करने वाले पाकिस्तान की हालत बेहद खराब हो चली है। मक्का में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ का दम भरने वाले पाकिस्तान के सामने अब इसी जुमले का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। हूतियों ने सऊदी अरब के तेल संसाधनों को निशाना बनाया तो उसकी आंच पाकिस्तान तक पहुंच गई और वहां पेट्रोल-डीजल का संकट खड़ा हो गया। यानी एक पर हमला हुआ और उसका असर दूसरे पर भी पड़ गया। ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ के इस अनोखे संस्करण पर पूरी दुनिया हंस रही है और पाकिस्तान सरकार अब इस चिंता में उलझी है कि देश में पेट्रोल-डीजल कैसे बचाया जाए।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सरकारी और निजी क्षेत्र में ईंधन की खपत कम करने के प्रस्तावों की समीक्षा की है। इनमें सप्ताह में चार दिन कार्यालय चलाने, कर्मचारियों की बारी-बारी से उपस्थिति, कुछ काम घर से कराने तथा बाजारों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सामान्य समय से पहले बंद करने जैसे विकल्प शामिल हैं। साथ ही सरकारी विभागों में गैर-जरूरी वाहनों के इस्तेमाल और आधिकारिक यात्राओं पर भी लगाम लगाने की संभावना पर विचार हो रहा है। यानी जिस देश में कुछ दिन पहले सामूहिक रक्षा की रणनीति बन रही थी, वहां अब सामूहिक रूप से पेट्रोल बचाने की रणनीति बन रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि पाकिस्तान सरकार ने 16 सितंबर से पेट्रोल की कीमत में 4.10 रुपये और उच्च गति वाले डीजल में 6.41 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इसके बाद पेट्रोल 384.34 रुपये और डीजल 415.83 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। पाक सरकार ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को इसका कारण बताया है। साथ ही पाकिस्तान ने अब पेट्रोलियम कीमतों में रोजाना बदलाव की व्यवस्था भी शुरू कर दी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का असर घरेलू कीमतों में तेजी से दिखाई दे।
ऊर्जा मंत्री अवैस लेघारी और जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है। पाक सरकार ने प्रधानमंत्री की ईंधन राहत योजना के जरिये इस बोझ को कुछ कम करने की कोशिश की है। इसके तहत मोटरसाइकिल चालकों को सप्ताह में पांच लीटर और कार मालिकों को दस दिन में दस लीटर रियायती पेट्रोल देने की व्यवस्था की गई है। इस योजना का विस्तार इस्लामाबाद में परीक्षण के बाद प्रांतों तक करने की तैयारी है।
उधर, पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय ईंधन सब्सिडी संचालन समिति ने पेट्रोल पंपों को होने वाले भुगतान को चौबीस घंटे के भीतर निपटाने का निर्देश भी दिया है। लेकिन सरकार खुद मान रही है कि यह राहत महंगे ईंधन के पूरे असर को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस बीच, ऊर्जा संकट के बीच पाकिस्तान यह बताकर कुछ राहत जरूर दिखाना चाहता है कि बिजली उत्पादन में उसने घरेलू संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल किया है। अगस्त 2026 में उसके कुल बिजली उत्पादन का 72 प्रतिशत घरेलू स्रोतों से आया। इसमें पनबिजली की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत, स्थानीय कोयले की 11 प्रतिशत, परमाणु ऊर्जा की 10 प्रतिशत, स्थानीय गैस की सात प्रतिशत, पवन ऊर्जा की छह प्रतिशत और सौर ऊर्जा की एक प्रतिशत रही। आयातित कोयले और आयातित गैस से केवल 28 प्रतिशत बिजली बनी।
इसके बावजूद संकट इतना गहरा है कि सरकार फिर से मितव्ययिता के उन उपायों पर लौटने की बात कर रही है, जिन्हें पहले भी लागू किया जा चुका है। बाजार जल्दी बंद कराने और कामकाजी दिनों को घटाने जैसे कदमों का कारोबारी समुदाय पहले विरोध करता रहा है। सूचना मंत्री अत्ता तरार ने ऐसे उपायों की वापसी के संकेत दिए हैं, हालांकि मुसादिक मलिक ने साफ कहा है कि ‘स्मार्ट लॉकडाउन’ को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। यानी सरकार के भीतर भी यह तय नहीं है कि संकट से निपटने के लिए ताला लगेगा या सिर्फ भाषण चलेगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू पाकिस्तान का मक्का रक्षा समझौता है। सात अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें साफ कहा गया कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान ने इसे सामूहिक प्रतिरोध और साझा सुरक्षा का ऐतिहासिक कदम बताया था। लेकिन सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान अब कह रहा है कि समझौते के तहत तत्काल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है और समझौते को अमल में लाने के लिए संस्थागत ढांचा तैयार किया जाना बाकी है।
यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की कूटनीतिक घोषणाओं और उसकी वास्तविक मजबूरियों के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। एक तरफ सऊदी अरब के साथ ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ का संकल्प है, दूसरी तरफ अपने यहां पेट्रोल बचाने के लिए चार दिन का कामकाजी सप्ताह, जल्दी बंद होते बाजार और रियायती पेट्रोल की योजना है।
बहरहाल, मक्का में पाकिस्तान ने सामूहिक सुरक्षा का सपना दिखाया था, लेकिन इस्लामाबाद में अब सवाल सामूहिक सुरक्षा से पहले ईंधन की उपलब्धता का है। सऊदी अरब को सुरक्षा का भरोसा देने वाला पाकिस्तान फिलहाल अपने पेट्रोल पंपों को राहत देने में व्यस्त है।