तालिबान की जीत से खुश है पाकिस्तान, भारत पर क्या होगा इसका असर?

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 17, 2021

अफगानिस्तान और भारत के राजनयिक और खुफिया एजेंसियों का मानना है कि तालिबान की जीत पाकिस्तान की सहायता के बिना संभव नहीं थी। काबुल में भारत के पूर्व राजदूत गौतम मुखोपाध्याय ने वर्णन करते हुए कहा है, अफगान के चेहरे के साथ पाकिस्तानी आक्रमण। यह दावा पाकिस्तान के तालिबान के साथ लंबे संबंधों के कारण है, 1994 में इसके जन्म के बाद से, 1996 में अफगानिस्तान के पहले अधिग्रहण के समर्थन से लेकर और 9/11 के बाद के अमेरिकी आक्रमण के बाद लड़ाकों और नेताओं को पाक ने आश्रय दिया। इन वर्षों के दौरान पाकिस्तान सुरक्षा एजेंसियों ने तालिबान के साथ बातचीत के लिए दबाव डाला, लेकिन जैसा कि तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को पाकिस्तानी जेल में लंबे समय तक कैद में रखा गया था, पाकिस्तान नहीं चाहता था कि तालिबान अफगान सरकार या अमेरिका से उसकी सहमति के बिना बात करे।

 

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पाकिस्तान अब तालिबान की जीत से खुश है। तत्कालीन उत्तरी गठबंधन के प्रमुख नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें उसके नेता अहमद शाह मसूद के दो भाई शामिल थे, रविवार को पाकिस्तान पहुंचे और सोमवार को विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से मुलाकात की। स्पष्ट रूप से उनका मानना है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान की नई व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि अफगानिस्तान ने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ दिया है। कई सेवानिवृत्त और सेवारत जनरल इस बात से खुश हैं कि आखिरकार काबुल में पाकिस्तान के पास दोस्त होंगे और तालिबान के लिए खुले तौर खुशी जाहिर की है।


तालिबान के साथ पाकिस्तान के पूराने रिश्ते

अफगान के अपदस्थ उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह और अशरफ गनी सरकार के अन्य सदस्यों ने भी आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सेना के विशेष बल और आईएसआई तालिबान का मार्गदर्शन कर रहे हैं। हालांकि यह सत्यापित करना संभव नहीं है कि पाकिस्तान का योगदान तालिबान को अपने क्षेत्र में आश्रय देने में रहा है।    

पाक की मौजूदा चिंता

पाकिस्तान एक तरफ खुश है तो वहीं दूसरी तरफ चिंता इस बात की है कि इससे शणार्थियों की आमद होगी, जो पाकिस्तान के कम संसाधनों पर भार पड़ेगा। दूसरी चिंता ये है कि अफगानिस्तान में तालिबान के उदय से पाकिस्तान में चरमपंथ की आग भड़क सकती है।

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भारत के लिए आगे क्या?

यह काफी हद तक निश्चित है कि भारत अफगानिस्तान में प्रभाव खो देगा, तालिबान की वापसी के कारण भारत-पाकिस्तान संबंध और खराब हो सकते हैं। आईसी 814 अपहरण में तालिबान की भूमिका और विमान को कंधार में खड़ा किया गया था, यह अभी भी भारतीय वार्ताकारों के दिमाग में ताजा है जिनमें से एक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ए के डोभाल भी थे। वहीं आईएसआई और तालिबान से निकटता रखने वाले हक्कानी नेटवर्क ने काबुल में भारतीय दूतावास पर घातक हमले किए थे ।

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