By सुरेश हिंदुस्तानी | Sep 15, 2026
आतंकवाद के प्रश्न पर पाकिस्तान की भूमिका लंबे समय से विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय रही है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दिखावा और आतंकी संगठनों के प्रति नरम रवैया, पाकिस्तान की विदेश एवं सुरक्षा नीति के इस विरोधाभासी चरित्र ने उसकी विश्वसनीयता को लगातार कठघरे में खड़ा किया है। आतंकी सरगना मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान की हालिया कार्रवाई भी इसी विरोधाभास की एक नई कड़ी के रूप में देखी जा रही है। उसे भगोड़ा घोषित करना और उसकी गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा करना पहली दृष्टि में कठोर कार्रवाई का संकेत देता है, लेकिन पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इसके पीछे की वास्तविक मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को भारत लंबे समय से आतंकवाद का प्रमुख चेहरा मानता रहा है, उसी मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान अब यह दावा कर रहा है कि वह उसकी पकड़ से बाहर है और संभवतः अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। यदि यह दावा सही है तो सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां इतने कुख्यात आतंकी के संबंध में इतनी अनभिज्ञ कैसे हो सकती हैं? और यदि वह पाकिस्तान से बाहर है तो उसके संगठनात्मक नेटवर्क, आर्थिक संसाधनों और संपर्कों पर कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती?
यहीं से पाकिस्तान की कार्रवाई पर संदेह की परतें गहरी होने लगती हैं।
पाकिस्तान की जांच एजेंसी एफआईए द्वारा मसूद अजहर को अपने अत्यंत खतरनाक आतंकवादियों की सूची में शामिल किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। लेकिन केवल किसी आतंकी को सूचीबद्ध कर देना आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। असली कसौटी गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया, आतंकी नेटवर्क का विघटन और उसके वित्तीय स्रोतों पर प्रभावी प्रहार है। यदि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तो वह आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को टालने की प्रशासनिक कवायद बनकर रह जाती है।
भारत के सुरक्षा तंत्र से जुड़े इनपुट यदि यह संकेत देते हैं कि मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है, तो पाकिस्तान के दावे की विश्वसनीयता और भी संदिग्ध हो जाती है। हालांकि ऐसे खुफिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है, लेकिन पाकिस्तान का अतीत उसके वर्तमान दावों पर सहज विश्वास करने की अनुमति नहीं देता।
पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र नया नहीं है। दुनिया पहले भी देख चुकी है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का दावा करने वाला पाकिस्तान अपनी ही धरती पर छिपे कुख्यात आतंकवादियों की मौजूदगी से लंबे समय तक इनकार करता रहा। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना इस संदर्भ में सबसे चर्चित उदाहरण है। अमेरिकी कार्रवाई में एबटाबाद में लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के उन दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे थे, जिनमें वह अपनी धरती पर आतंकवादी सरगनाओं की मौजूदगी से अनभिज्ञता जताता रहा था।
आतंकी मसूद अजहर पर पाकिस्तान सरकार की कार्यवाही को इसलिए भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान में आतंकी सरगनाओं पर न तो सरकार का नियंत्रण है और न ही सेना की ही चलती है। आतंकियों का अपना एक तंत्र है। जिनमें कोई भी दखल नहीं दे सकता। पाकिस्तान में तीन शक्ति केंद्र माने जाते हैं, जिनमें सरकार, सेना और आतंकवादी हैं। कई बार यह भी देखने में आता है कि वहां की सरकार किसकी होगी, यह आतंकी और सेना तय करती है। इसलिए सरकार, आतंकियों पर कठोर कार्यवाही करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाती। और आतंकी फलीभूत होते रहते हैं।
इस पृष्ठभूमि में मसूद अजहर पर घोषित इनाम को केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में देखना कठिन है। इसके पीछे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की मंशा भी दिखाई देती है। विशेषकर आतंकवाद के वित्तपोषण और धनशोधन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में पाकिस्तान पर लगातार दबाव रहा है। ऐसे समय में किसी कुख्यात आतंकी के विरुद्ध सार्वजनिक कार्रवाई का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह संदेश देने का प्रयास हो सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय है।
लेकिन आज विश्व पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क है। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में अब केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह देखता है कि आतंकवादी संगठनों की वित्तीय धमनियां कितनी प्रभावी ढंग से रोकी गईं, उनके प्रशिक्षण शिविरों और नेटवर्क पर क्या कार्रवाई हुई, आतंकी सरगनाओं को न्याय के कठघरे में कब लाया गया और आतंकवाद को संरक्षण देने वाली संरचनाओं को कितना ध्वस्त किया गया।
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। विदेशी सहायता, ऋण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक सहायता उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में आतंकवाद के वित्तपोषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ जाता है। यदि पाकिस्तान आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहता है तो उस पर आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उसके द्वारा की जाने वाली प्रत्येक कार्रवाई को उसके आर्थिक और कूटनीतिक संदर्भ में भी परखना आवश्यक है।
भारत के लिए यह समय पाकिस्तान के किसी भी दावे से प्रभावित होने के बजाय तथ्यों, प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर अपनी आतंकवाद विरोधी नीति को और सुदृढ़ करने का है। आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह वैश्विक शांति, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानव सभ्यता के लिए चुनौती है। इसलिए आतंकवाद को संरक्षण देने वाली किसी भी व्यवस्था के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शून्य-सहनशीलता की नीति अपनानी होगी।
मसूद अजहर पर इनाम की घोषणा यदि वास्तविक कार्रवाई की दिशा में पहला कदम है तो पाकिस्तान को उसे प्रमाणित करने में देर नहीं करनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह मसूद अजहर की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, यदि वह पाकिस्तान में है तो उसे गिरफ्तार करे, उसके नेटवर्क को ध्वस्त करे और उसके विरुद्ध पारदर्शी न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करे।
अन्यथा यह कार्रवाई भी पाकिस्तान की उन अनेक घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगी, जिनमें शब्द बहुत थे, लेकिन परिणाम नगण्य।
आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अब दुनिया को दावों की नहीं, कार्रवाई की भाषा चाहिए। पाकिस्तान यदि वास्तव में अपनी छवि बदलना चाहता है तो उसे नौटंकी से आगे बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। क्योंकि आतंकवाद के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की स्मृति अब इतनी कमजोर नहीं रही कि पुरानी चालें नए आवरण में आसानी से सफल हो जाएं।
- सुरेश हिंदुस्तानी,
वरिष्ठ पत्रकार