समस्याओं के निराकरण के बजाए अखाड़ा बनी संसद

By योगेंद्र योगी | Feb 10, 2026

देश में मौजूद गंभीर मुद्दों पर चर्चा और उनके समाधान के प्रयासों के बजाए निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए संसद में दलगत राजनीति भारी पड़ रही है। संसद सत्तारुढ़ और विपक्ष के लिए अखाड़ा बनी हुई है। देश के कर्णधारों को देश की बिगड़ती दिशा—दशा की कोई परवाह नहीं है। दिल्ली अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और अन्य शोधों के अनुसार, वायु प्रदूषण न केवल श्वसन प्रणाली, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। जहरीली हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तनाव, चिंता, अवसाद (डिप्रेशन), संज्ञानात्मक हानि और बच्चों में एडीएचडी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, जिसे विशेषज्ञ एक 'मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल' मान रहे हैं। 


एरोसोल सूक्ष्म कणों पीएम 2.5 और जहरीली गैसों से दिमागी सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव होता है, जो अवसाद और चिड़चिड़ापन पैदा करता है। प्रदूषण के कारण वयस्कों में भावनात्मक थकान, निर्णय लेने की क्षमता में कमी और बच्चों में सीखने में कठिनाई देखी जा रही है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसे तंत्रिका अपक्षयी विकारों का खतरा बढ़ जाता है। अध्ययन बताते हैं कि पीएम 2.5 के एरोसोल घटक, डिप्रेशन और चिंता से सीधे जुड़े हैं। एम्स की एक अन्य रिसर्च में स्पीच एनालिसिस तकनीक के जरिए डिप्रेशन की पहचान की जा रही है, जो बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य पर प्रदूषण का असर कितना गहरा है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्मॉग के दौरान बाहर निकलने से बचें, मास्क का उपयोग करें, घर में एयर प्यूरीफायर लगाएं और तनाव कम करने के लिए योग व स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। 

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इसी तरह इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी की 77वीं वार्षिक राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बताया कि आज भारत में करीब 60 प्रतिशत मानसिक रोग 35 साल से कम उम्र के लोगों में पाए जा रहे हैं। यह आंकड़ा इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यही उम्र पढ़ाई पूरी करने, करियर बनाने और समाज में सक्रिय भूमिका निभाने की होती है। अगर इसी समय मानसिक समस्याएं शुरू हो जाएं और उनका इलाज न हो, तो इसका असर पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है। कांफ्रेंस में यह भी बताया गया कि कोविड-19 महामारी, आर्थिक अस्थिरता और बदलती सामाजिक संरचना ने युवाओं के तनाव को और बढ़ा दिया है। महामारी के बाद पढ़ाई, नौकरी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने चिंता और डिप्रेशन के मामलों में इजाफा किया है।


जिम्मेदार राष्ट्र सूचकांक:2026 में सिंगापुर पहले स्थान पर काबिज है, वहीं भारत 16वें नंबर पर है। रिपोर्ट में यह आंका गया है कि कोई देश अपने लोगों और पूरी दुनिया के लिए कितना जिम्मेदार है। इस सूची में सिंगापुर को दुनिया का सबसे जिम्मेदार देश घोषित किया गया है। सिंगापुर ने शासन, समाज और पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर काम करके पहला स्थान हासिल किया है। इसी तरह साल 2026 के ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स में भारत 48.0 के स्कोर के साथ इस फेहरिस्त में 32वें स्थान पर है। यह पिछले साल के मुकाबले दो स्थान नीचे और 1.8 अंक कम है। सॉफ्ट पावर किसी देश की उस क्षमता को कहते हैं, जिसमें वह सैन्य बल के बजाय अपनी संस्कृति और मूल्यों से दूसरे देशों को प्रभावित करता है। 


विश्व रैकिंग में भारत का स्थान और घरेलू आतंरिक चुनौतियों पर चर्चा और इनके समाधान के बजाए सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच संसद तमाशा बनी हुई है। सांसद देश की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा करने के बजाए गरिमा को तार—तार करने में लगे हुए हैं। संसद के मौजूदा सत्र में लोकसभा में भारी हंगामे के दौरान कुछ सांसदों ने स्पीकर के आसन की ओर कागज फेंके, जिसके बाद उन्हें सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। यह कार्रवाई संसदीय कार्य मंत्री के प्रस्ताव पर हुई, जिसे सदन ने मंजूर कर लिया। दरअसल, राहुल गांधी को बोलने से रोके जाने पर विपक्षी दल भड़क गए थे और हंगामा शुरू कर दिया था। इस मामले में कुल आठ सांसदों पर कार्रवाई हुई और उन्हें निलंबित कर दिया गया।


लोकसभा में पीएम मोदी का अभिभाषण होना था, उनको धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देना था। इसके लिए पीएम मोदी लोकसभा में पहुंच भी चुके थे। लेकिन उनका अभिभाषण शुरू होने से पहले ही सदन की कार्यवाही गुरुवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्ष के हंगामे की वजह से सदन की कार्यवाही स्थगित की गई। भारत- यूएस ट्रेड डील पर केंद्रीय वाणिज्‍य मंत्री पीयूष गोयल ने सरकार का पक्ष रखना शुरू किया था, तो विपक्षी सांसदों ने हंगामा शुरू कर दिया था। पीयूष गोयल ने इस दौरान कहा कि भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील पर कहा कि इसमें किसानों के हितों को सुरक्षित रक्षा गया है। इससे पहले राहुल गांधी आज फिर संसद में पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की वो किताब लेकर पहुंचे। लोकसभा में लगातार हंगामा होता रहा।


यही वजह है देश के युवा और उद्यमियों का लगातार भारत से मोह भंग हो रहा है। पिछले साल 2024 में भारत के दो लाख से भी ज्यादा अमीर लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ दी। भारत छोड़कर विदेशों में बसने का चलन साल दर साल लगातार बढ़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि देश के लोगों को भारत की लाइफस्टाइल और यहां की आबो-हवा पसंद नहीं आ रही है, लेकिन उनको विदेशी धरती की लाइफस्टाइल ज्यादा लुभावनी और सुरक्षित लग रही है। साल 2024 में 2 लाख 6 हजार लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी। साल 2023 में 2 लाख 16 हजार 219 लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा और नौकरियों के सीमित अवसर, सामाजिक असमानता और राजनीतिक माहौल लोगों को देश छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। देश के बजाए निहित राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देने से समस्याओं का अंबार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इससे पहले कि हालात बेकाबू हों देश के कर्णधार जिम्मेदारी का एहसास करें और समस्याओं के निदान में गंभीरता दिखाएं।

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