कोरोना की मार तो लोगों ने झेल ली लेकिन अब महंगाई की मार कैसे झेलें?

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Oct 08, 2021

देश में कोरोना की महामारी घटी तो अब महंगाई की महामारी से लोगों को जूझना पड़ रहा है। कोरोना घटा तो लोग घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर बाहर जाना चाहते हैं लेकिन जाएं कैसे ? पेट्रोल के दाम 100 रु. लीटर और डीजल के 90 रु. को पार कर गए। कार-मालिकों को सोचना पड़ रहा है कि क्या करें ? कार बेच दें और बसों, मेट्रो या आटो रिक्शा से जाया करें लेकिन उनके किराए भी कूद-कूदकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। पेट्रोल और डीजल की सीधी मार सिर्फ मध्यम वर्ग पर ही नहीं पड़ रही है, गरीब वर्ग भी परेशान है। तेल की कीमत बढ़ी तो खाने-पीने की रोजमर्रा की चीजों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। सब्जियां तो फलों के दाम बिक रही हैं और फल ग्राहकों की पहुंच के बाहर हो रहे हैं।

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बेचारे दर्जियों और धोबियों की भी शामत आ गई। जब लोग अपने घरों में घिरे रहे तो उन्हें धोबी से कपड़े धुलाने और दर्जी से नए कपड़े सिलाने की जरूरत ही कहां रह गई? भवन-निर्माण का धंधा ठप्प होने के कारण लाखों मजदूर अपने गांवों में ही जाकर पड़े रहे। यही हाल ड्राइवरों का हुआ। बस मौज किसी की रही तो डॉक्टरों और अस्पताल मालिकों की रही। उन्होंने नोटों की बरसात झेली और मालामाल हो गए लेकिन वे डॉक्टर, वे नर्सें और वे कर्मचारी हमेशा श्रद्धा के पात्र बने रहेंगे, जिन्होंने इस महामारी के दौरान मरीजों की लगन से सेवा की और उनमें से कइयों ने अपनी जान की भी परवाह भी नहीं की। वे मनुष्य के रूप में देवता थे। लेकिन यह न भूलें कि महंगाई के इस युग में लाखों ऐसे मरीज भी रहे, जिन्हें ठीक से दवा भी नसीब नहीं हुई। हजारों की जान इलाज के अभाव में चली गई। केंद्र और राज्य सरकारों ने कोरोना को काबू करने का भरसक प्रयत्न किया है लेकिन यदि वह इस महंगाई पर काबू नहीं कर सकी तो ये मुनाफाखोर लोग उसे ले डूबेंगे। महंगाई की मार कोरोना की मार से ज्यादा खतरनाक सिद्ध होगी। कोरोना को तो भगवान का प्रकोप मानकर लोगों ने किसी तरह सह लिया लेकिन महंगाई का गुस्सा मुनाफाखोरों पर तो उतरेगा ही, जनता सरकार को भी नहीं बख्शेगी।

- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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