आतंकवाद के प्रति नरम रुख रखने वालों और विकास के विरोधियों से सावधान रहे गुजरात की जनता

By गौतम मोरारका | Nov 28, 2022

गुजरात चुनाव में आतंकवाद भी बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। जो लोग कह रहे हैं कि यह राज्य से संबंधित मुद्दा नहीं है उन्हें शायद पता नहीं कि गुजरात ने संप्रग शासनकाल के दौरान कई आतंकवादी हमले झेले हैं। केंद्र सरकार ने जबसे आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है तबसे देश में शांति है और शांति से ही प्रगति आती है। ऐसे में चुनाव प्रचार के दौरान यदि तुष्टिकरण की राजनीति और आतंकवाद के खतरे के प्रति कोई सचेत करे तो इसमें कोई गलत बात नजर नहीं आती।

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देखा जाये तो प्रधानमंत्री का यह कथन एकदम सही है। जहां तक गुजरात में कांग्रेस की ओर से संभल कर प्रचार करने की बात है तो उसका कारण यही है कि वह पिछली गलतियों से सबक ले रही है। मगर यह भी याद रखना चाहिए कि रणनीति के तहत कांग्रेस भले इस बार बाटला मामले को चुनाव में नहीं उठा रही हो लेकिन इसी साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उसने इस मुद्दे को उठाया था। दरअसल कांग्रेस ने बाटला मुठभेड़ मामले को 'बोतल में बंद जिन्न' की तरह रखा हुआ है। इस बोतल का ढक्कन ज्यादातर दिग्विजय सिंह ही खोलते हैं लेकिन कई बार रणनीति के तहत यह जिम्मेदारी अन्यों को भी दे दी जाती है। जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान बरेलवी मुसलमानों के धार्मिक गुरु और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खां ने कह दिया था कि बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गये युवक आतंकवादी नहीं बल्कि शहीद थे। यही नहीं उन्होंने शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बारे में कह दिया था कि पुलिस ने उनकी हत्या की थी। तौकीर रजा खां ने उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों के समर्थन का ऐलान करते हुए यह बात कही थी जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा था। इसलिए कांग्रेस गुजरात चुनावों में संभल कर चल रही है।

आतंकवाद के प्रति कांग्रेस का नरम रुख ही बड़ी समस्या नहीं है बल्कि समस्या यह भी है कि कांग्रेस का संदिग्ध संगठनों के साथ भी गहरा नाता रहा है। कौन भूल सकता है कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष दल बताने वाली कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के समय इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और असम विधानसभा चुनावों के समय एआईयूडीएफ (AIUDF) जैसे साम्प्रदायिक दलों से गठबंधन किया था। इसके अलावा केरल में जमात-ए-इस्लामी के राजनीतिक मोर्चे वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के साथ कांग्रेस निकाय चुनावों में गठबंधन कर सबको चौंका चुकी है। हम आपको यह भी बताना चाहेंगे कि चुनावों के समय आवश्यकता पड़ने पर कांग्रेस नेता जैसे खुद को कभी हिंदू और कभी धर्मनिरपेक्ष बताते हैं उसी तरह काम निकलने के बाद कांग्रेस विभिन्न दलों को गठबंधन से बाहर का रास्ता भी दिखा देती है। उल्लेखनीय है कि विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट, असम में एआईयूडीएफ और केरल में वेलफेयर पार्टी को अपने गठबंधन से बाहर कर दिया था।

जहां तक मेधा पाटकर की बात है तो आपको बता दें कि उन्होंने गुजरात की जीवनरेखा नर्मदा परियोजना का विरोध किया था। यदि नर्मदा परियोजना को तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे नहीं बढ़ाया होता तो गुजरात में जल संकट आज भी बरकरार होता। ऐसे में सवाल उठता है कि विकास परियोजनाओं में रोड़े अटकाने वाले लोग यदि सत्ता में आयेंगे तो जनता का क्या होगा? जहां तक आम आदमी पार्टी से मेधा पाटकर के रिश्ते की बात है तो आपको याद दिला दें कि ‘आप’ ने ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की संस्थापक सदस्य मेधा पाटकर को 2014 के लोकसभा चुनावों में मुंबई की उत्तर पूर्व सीट से मैदान में उतारा था।

बहरहाल, जहां तक विकास परियोजनाओं के विरोधियों को आगे बढ़ाने की बात है तो आम आदमी पार्टी पहले भी ऐसा कर चुकी है। मणिपुर विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी बनाकर मैदान में उतरने वाली इरोम चानू शर्मिला का आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने खुलकर समर्थन किया था। लेकिन राज्य की जनता ने शर्मिला को ऐसी बुरी तरह खारिज किया था कि वह अपनी खुद की विधानसभा सीट भी नहीं बचा पाई थीं। अरविंद केजरीवाल जिन्हें आयरन लेडी करार दे रहे थे उन्हें चुनाव में मात्र 90 वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। ऐसे में अब गुजरात की जनता को सजग रह कर मतदान करने की जरूरत है क्योंकि यदि आतंकवाद के हितैषी और विकास परियोजनाओं के विरोधी मजबूत हुए तो प्रदेश को नुकसान उठाना पड़ेगा।

-गौतम मोरारका

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