खुद को वैश्विक चौधरी समझने वाला अमेरिका दक्षिण एशिया में इसलिए ज्यादा रुचि दिखा रहा है

By संतोष पाठक | Aug 22, 2019

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पकिस्तानी के प्रधानमंत्री इमरान खान से एक-एक करके टेलीफोन पर बातचीत की और इसी के साथ एक बार फिर से यह सवाल खड़ा हो गया कि आखिर अब अंकल सैम दक्षिण एशिया में क्या करना चाहते हैं। आखिर अमेरिका अब दक्षिण एशिया में किस तरह की भूमिका तलाश कर रहा है। यह सवाल लगातार बदलते भारत को देखते हुए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अब नया भारत अपने फैसलें खुद लेने में सक्षम हो गया है। जम्मू-कश्मीर जैसे अहम लटके हुए मसले पर जिस तेजी से भारत सरकार ने फैसला किया, संसद के दोनों सदनों ने भारी बहुमत से पारित कर दिया और प्रदेश में शांति बनाए रखने के हर संभव प्रयास भारत सरकार की तरफ से किये गये जो कामयाब भी रहे। 

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ये वही डोनाल्ड हैं जिन्होंने इमरान खान की हाल में हुई अमेरिकी यात्रा के दौरान यह झूठ बोला था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मध्यस्थता का अनुरोध किया था- वो भी कश्मीर मुद्दे पर। उस कश्मीर मुद्दे पर जिसको लेकर अहम फैसला शायद नरेंद्र मोदी पहले ही कर चुके थे कि उन्हें करना क्या है ? ऐसे में यह तो साफ-साफ नजर आ ही रहा है कि अमेरिका कश्मीर के मसले पर पुरानी चौधराहट को वापस पाना चाहता है। अमेरिका फिर से चाहता है कि उसे कश्मीर के मसले पर मध्यस्थ मान लिया जाए ताकि वो भारत पाकिस्तान की आपसी लड़ाई का उसी तरह से फायदा उठाये जैसे कि वह अब तक उठाता आया है। लेकिन शायद अमेरिका को अब इस बात का अहसास नहीं हो पा रहा है कि दुनिया बदल चुकी है। खास बात यह है कि भारत अब बदल चुका है। ये नया भारत है जो समस्या को टालता या पालता नहीं है बल्कि उसका समाधान निकालता है भले ही रास्ता कितना ही कठिन क्यों न हो। 

जम्मू-कश्मीर के मसले पर नरेंद्र मोदी सरकार ने कठोर कदम उठाकर अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय तो दे ही दिया है। जम्मू-कश्मीर का वह मसला जो 1947 से ही भारत के लिए नासूर बना हुआ था। जिस जम्मू-कश्मीर के लिए भारत को पाकिस्तान के साथ 4-4 लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। जिस कश्मीर के लिए भारत को पिछले 30 सालों से आतंकवाद का दर्द झेलना पड़ रहा है। उस कश्मीर की समस्या का इस तरह से भी कोई समाधान निकाला जा सकता है, ये अब तक किसी सरकार ने सोचा तक नहीं था। अब तक भारत की सरकारें कश्मीर समस्या पर एक बंधे-बधाए ढर्रे के साथ सोचा करती थीं और उसी के अनुसार काम किया करती थीं। सोच कश्मीर समस्या के समाधान से ज्यादा इस बात पर टिकी रहती थी कि उनका कार्यकाल शांति से निकल जाए। जब भी जिक्र कश्मीर समस्या का आता था तो उस समय की भारत सरकारें यह मान कर चला करती थीं कि पाकिस्तान को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल करना ही होगा। पाकिस्तान के बिना कश्मीर समस्या के समाधान के बारे में सोचना ही गुनाह माना जाता था लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सरकार का भी रवैया पूरी तरह से बदल गया है। अब देश में सरकार भी नई है, देश की जनता का मूड भी नया है। भारत बदल गया है और भारत में भी सब कुछ बदल गया है। 

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हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति भी बदल रहे भारत के सत्य को स्वीकार कर रहे हैं इसलिए जहां भारत के प्रधानमंत्री से वो 30 मिनट तक बात करते हैं वहीं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को सिर्फ 12 मिनट देते हैं। भारत के प्रधानमंत्री के साथ उनकी बातचीत द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर होती है और कश्मीर इस बातचीत का छोटा सा हिस्सा होता है। वहीं इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत में पाकिस्तानी पीएम कश्मीर से आगे बढ़ ही नहीं पाते हैं। इमरान खान को अमेरिकी राष्ट्रपति यह साफ-साफ बता देते हैं कि भारत के खिलाफ बयानबाजी करते समय उन्हें संयम बरतना होगा। अमेरिका ने यह कह कर एक बार फिर से पाकिस्तान को साफ शब्दों में स्पष्ट संदेश दे दिया कि कश्मीर के मसले पर अब पाकिस्तान की पुरानी पैंतरेबाजी नहीं चलेगी। 

इसके अगले दिन भारत के रक्षा मंत्री और अमेरिका के रक्षा मंत्री के बीच बातचीत होती है और इसमें एक बार फिर भारत की ओर से राजनाथ सिंह अमेरिकी रक्षा मंत्री को यह बता देते हैं कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मसला है। राजनाथ सिंह साथ ही अमेरिकी रक्षा मंत्री को यह भी बताते हैं कि पड़ोसी पाकिस्तान किस तरह से आतंकवाद को एक टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हुए इस क्षेत्र के माहौल को भड़काने में लगा हुआ है। पाकिस्तान की तरफ से लगातार आ रहीं भड़काऊ बयानबाजियों का भी जिक्र किया गया। ऐसा करके एक बार फिर से भारत ने गेंद को पाकिस्तान के पाले में डालते हुए अमेरिका को यह सन्देश दे दिया कि अगर आपको अपनी भूमिका निभाने की इतनी ही इच्छा है तो पाकिस्तान के फ्रंट पर जाकर काम कीजिए। पाकिस्तान को समझाना ही एकमात्र अच्छा काम है जो अमेरिका को करना चाहिए। 

इस बातचीत के अगले ही दिन यानी बुधवार को फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान आ जाता है जिसमें वो कश्मीर की जनसंख्या का जिक्र करते हुए हालात को मुश्किल बताते हैं और साथ ही दावा करते हैं कि नरेंद्र मोदी के साथ कुछ दिनों में होने वाली मुलाकात में वो इस मुद्दे पर बात करेंगे और मध्यस्थता करने की कोशिश करेंगे। मध्यस्थता- कश्मीर के मसले पर- भारत पाकिस्तान के बीच। जबकि भारत लगातार इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर खारिज करते हुए बार-बार अमेरिका को यह संदेश दे रहा है कि अगर वाकई अमेरिका कुछ करना ही चाहता है तो पाकिस्तान को सुधारने के लिए काम करे। 

अब तक पाकिस्तान की वजह से दक्षिण एशिया में दखल रखने वाला अमेरिका बदले हालात से परेशान है। अगले साल वहां राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अफगानिस्तान से सेना निकाल कर डोनाल्ड घरेलू स्तर पर मतदाताओं का दिल जीतना चाहते हैं। कश्मीर के मसले पर हाल ही में तालिबान के दिये बयान से यह साफ हो गया कि अब तालिबान भी पाकिस्तान की सुनना नहीं चाहता। ऐसे में इस पूरे क्षेत्र में अब सिर्फ भारत ही ऐसा देश बच जाता है जिसकी आवाज का वजन है, जो भरोसेमंद है और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर प्रतिबद्ध और वचनबद्ध है इसलिए अमेरिका बहुत ही उम्मीदों से भारत की तरफ देख रहा है। जाहिर है कि यह भारत के लिए एक बड़ा मौका है लेकिन सावधानी भी जरूरी है क्योंकि अमेरिका समस्या के समाधान से ज्यादा उसे लटकाए रखने में विश्वास रखता है ताकि उसकी चौधराहट बनी रहे।

-संतोष पाठक

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