वही शिव है, वही संत है (कविता)

By संजय तिवारी | Feb 15, 2018

माघ की महारात 

शिव से शिव का संवाद 

अनहद नाद 

पिंड से ब्रह्माण्ड तक 

ब्रह्माण्ड से पिंड तक 

विष का शमन 

ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन 


महा शिव रात्रि 

कोई त्यौहार नहीं है 

केवल किसी उपासना का 

आधार नहीं है 


इस विज्ञान से भी बड़ा महा विज्ञान है 

पिंड में जीवन का एक मात्र संज्ञान है 


शिव की शक्ति 

शक्ति का शिव 

किसी की भक्ति

किसी का इव  

सृजन का आधार 

संस्कृति का आभार 

प्रकृति का उद्धार 

अप्रकृति का संहार 


यह मृत्यु का जीवन है, 

अमृत का सागर है 

निशानिमन्त्रण है, 

आत्म नियंत्रण है 

विष है, सुधा है 

तृप्ति है,  क्षुधा है 

आग्रह है, अबीर है 

सुख है, पीर है 

कुछ अंत है, कहीं अनंत है 

वही शिव है, वही संत है। 


अबकी फिर आयी है 

शिव की रात 

मन से देखें 

प्रकृति की बारात 

इस माघ की महानिशा 

बदलेगी दिशा 

उर्ध्वगामी ऊर्जा का प्रवाह 

संभावनाएं अथाह 


सुख की मात्रा 

महादेव की महायात्रा 

सती की आह 

गंगा का प्रवाह 

बिल्वपत्र से पलाश तक 

धरती से कैलाश तक 

ज्योतिर्पीठों के लिंग 

हिमग्राम का आत्मलिंग 


परमाणु से परमाणु तक 

महकाया से विषाणु तक 

संध्या से प्रभा तक 

क्लांति से आभा तक

 

अर्चना 

आराधना 

उपासना 

साधना 

पूजा 

वंदना 

स्तुति 

अर्घ्य 

हवन  

और आरती 

अद्भुत है भारती 


पृश्नि ब्रह्माण्ड में

जम्बू द्वीप में  

आर्यावर्त की 

यही तो शक्ति है 

संहार से पूर्व 

सृजन 

पोषण और संवेदना में 

जो समायी है 

यही शिवभक्ति है। 

- संजय तिवारी

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