देखने का नजरिया (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Aug 05, 2022

पति ने पत्नी को जोरदार चांटा लगाते हुए कहा कि पति-पत्नी के संबंध चार लोगों की बीच की गई शादी या फिर फोटो एल्बम में सजी तस्वीरों पर नहीं टिकती। अगर ऐसा ही होता तो पुराने जमाने में कोई शादी न करता। यह तो एक-दूसरे के विश्वास पर टिकती है। इसलिए बार-बार यह कहना बंद करो कि जब मैं तुम्हें चार लोगों के बीच बेइज्जत करूँगी तब पता चलेगा कि मैं क्या चीज़ हूँ। पति की इज्जत उतारने से भला तुम्हें कौनसा सुख मिलेगा? 

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फिर उस दिन दाल में थोड़ा सा नमक क्या ज्यादा हो गया आप तो अपनी माँ की दाल याद करने लगे। ऐसा कौनसा मैंने जहर बना दिया था। जो आप अपनी माँ को याद करने लगे?

जब आदमी की सोच सो जाए तब एक बार के लिए उसे जगाया जा सकता है, लेकिन जो जानबूझकर तिल का पहाड़ में बनाने पर आमदा हो जाएँ, उनकी सोच को नहीं बदला जा सकता। मैंने माँ की दाल इसलिए याद की थी कि तुम इसी बहाने उनसे फोन पर बात कर लो। उनका भी मन करता है कि अपनी बहू से बात करे। मैं तो बात करता हूँ। लेकिन वह भी तुम्हें बहू से ज्यादा बेटी की तरह चाहती हैं। पत्नी कुछ कहती तभी पति का फोन बज उठा। भाभी ने फोन किया था। भाभी ने बताया कि मेरे किड्नी देने के बावजूद मैं तुम्हारे भैया को नहीं बचा सकी। इतना कहते-कहते वह बिफर गयीं....। 

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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