नागपूजा (व्यंग्य)

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मुरारी जी ने एक ही सॉंस में दिल में भरा ग़ुबार निकाल दिया। नौरंगी लाल ने बिना आपा खोए शांति से मुरारी जी की ओर देखा- “भाई तुम्हारी नाराज़गी जायज़ है.. पर तुमने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि इस एक दिन की पूजा अर्चना के बाद कितने नाग मर जाते थे।

नागपंचमी की पूर्व संध्या पर कई वर्षों के अंतराल के बाद मुरारी जी से वन विभाग में कार्यरत उनके पुराने मित्र नौरंगी लाल टकरा गए। हाल-चाल पूछने की औपचारिकता भूलकर वह मित्र पर एक क़िस्म से बिफर ही पड़े- “यार, तुम्हारा जंगल विभाग भी कैसे कैसे अजीब क़ानून ले आता है.. दो साल से नागपंचमी पर नाग के दर्शन भी नहीं कर पा रहे हैं.. एक भी सँपेरा डर के मारे कॉलोनी में नहीं फटकता.. तुम लोगों ने सॉंप पकड़ने पर रोग लगा दी है.. क्या तुम लोग नागपंचमी नहीं मनाते.. नागपूजा की ज़रूरत नहीं लगती तुम्हें”

मुरारी जी ने एक ही सॉंस में दिल में भरा ग़ुबार निकाल दिया। नौरंगी लाल ने बिना आपा खोए शांति से मुरारी जी की ओर देखा- “भाई तुम्हारी नाराज़गी जायज़ है.. पर तुमने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि इस एक दिन की पूजा अर्चना के बाद कितने नाग मर जाते थे.. सरकार को नागों की चिन्ता है.. इसलिए नाग पकड़ने पर सरकार को रोक लगाना पड़ी।”

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“फिर तुम कैसे नागपूजा करते हो” 

“यार मेरे घर के पीछे एक बाम्बी है.. उसी के मुहाने पर हम लोग कटोरी में दूध और पूजा की सामग्री रख आते हैं.. सरकार का नियम तो हम सबको मानना ही पड़ेगा, सो हमने यह तरीक़ा निकाला है कि सॉंप भी न मरे और न क़ानून भी न टूटे.. तुम भी हमारे तरीक़े को अपना सकते हो और इसी विधि से पूजा कर सकते हो”

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मुरारी जी को नौरंगी जी की बात जम गई। उन्होंने नागपूजा की यह तरकीब अपने कुछ और मित्रों से शेयर कर दी। अगले दिन कॉलोनी के किनारे पर रहने वाले विधायक जी के घर के दरवाज़े पर आठ-दस कटोरियों में दूध और पूजा की सामग्री रखी मिली।

- अरुण अर्णव खरे

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