रंगोत्सव होली के सियासी और सांस्कृतिक मायने

By कमलेश पांडे | Mar 04, 2026

रंगपर्व होली भले ही भारतीय सभ्यता-संस्कृति से अनुप्राणित है, लेकिन गुलामी काल में यह पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के सामाजिक दुष्प्रभाव से भी यह अछूती नहीं बची है। आमतौर पर यह रंगोत्सव देश-दुनिया में हंसी ठिठोली का त्योहार समझा जाता है। इस दौरान आमलोगों में रंग-गुलाल खेलने के साथ-साथ मीठे पकवानों, नमकीन मांसाहारों और नशीले पदार्थों के सेवन जैसे (भांग), द्रव्य (शराब) और गैस (गांजा) का प्रयोग बहुतायत में देखने को मिलता है जिससे लोग झूम उठते हैं।


आमतौर पर शुद्र यानी सेवक पर्व होली आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है, जब घोर दुश्मन भी एक दूसरे के गले मिलने से नहीं हिचकते हैं। बदलते जमाने के अनुरूप लोकपर्व होली का रंगोत्सव भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व ब्रांडिंग का भी पर्याय बन चुका है। यह वसंत पर्व अब सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक तनाव और चुनावी रणनीति का प्रतीक बन गया है। लोकतांत्रिक भारत में यह प्रवृत्ति वर्ष दर वर्ष गहराती जा रही है। खासकर 2026 में ही बिहार, यूपी और अन्य राज्यों में नेताओं के बड़बोले बयानों ने इसे और उभार दिया। इससे सांप्रदायिक विवाद को भी बढ़ावा मिला। 

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जहां बीजेपी विधायकों और अधिकारियों ने मुस्लिम समुदाय से होली पर घर में रहने या नमाज स्थगित करने की अपील की, जिससे विपक्ष ने ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। वहीं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हुड़दंगियों पर सख्ती का संदेश दिया, जबकि बिहार में शराबबंदी पर बहस ने इसे राजनीतिक रंग से जोड़ा। कहना न होगा कि अब ये बयान हिंदुत्व के सियासी एजेंडे को मजबूत करने की भरपूर कोशिश दिखाते हैं। इससे चुनावी रणनीति भी प्रभावित होती है। बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौर में होली पर नेताओं ने रंग खेलकर वोटरों से जुड़ने की कोशिश की। उधर, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के होली बहिष्कार के ऐलान पर बीजेपी ने हिंदू विरोधी करार दिया।


देखा जाए तो ऐसे विवाद आने वाले चुनावों में सामाजिक ध्रुवीकरण का हथियार बन सकते हैं। लिहाजा इन्हें काबू में करने के लिए पुख्ता प्रशासनिक इंतजाम किये गए हैं। खासकर राज्यों में पुलिस ने सांप्रदायिक तनाव, स्टंटबाजी और अराजकता रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया। सिर्फ दिल्ली में ही 15,000 जवान, ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी हो रही है। इजरायल-ईरान युद्ध के मद्देनजर पूरे देश में ऐसी ही निगरानी की जा रही है। ऐसे  में यह सब इस महत्वपूर्ण त्योहार को शांतिपूर्ण बनाए रखने की चुनौती को भी दर्शाता है।


भारत में होली का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है जो सामाजिक एकता से सांस्कृतिक ध्रुवीकरण तक फैला हुआ है, जहां यह हिंदुत्व का प्रतीक और चुनावी मुद्दा बन जाता है। अतीत में झांकें तो ऐतिहासिक रूप से मुगल काल में यह रंगपर्व सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक भी बना रहा, जबकि आज यह सियासी रंग ले लेता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यदि नजर डालें तो तो मौर्य काल से मुगल काल तक होली भव्यता से मनाई जाती थी, जहां अशोक और अकबर जैसे शासक खुद भी इसमें भाग लेते थे। तब भी यह सामाजिक बाधाओं को तोड़ने का अवसर था, और आज भी यह जाति-वर्ग भेद मिटाकर सामाजिक एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देता था।


आज आधुनिक समय में भी होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बनकर राजनीतिक संदेशों से जुड़ गया है। आधुनिक राजनीतिकरण की प्रवृत्ति में बीजेपी जैसे दल इसे हिंदू एकता के प्रतीक के रूप में प्रचारित करते हैं, जबकि विपक्ष बहिष्कार जैसे बयानों को ध्रुवीकरण बताता है। वर्ष 2026 में छत्तीसगढ़, बिहार में नेताओं के बयानों ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया है। चुनावी वर्षों में रंग खेलना वोटर जुड़ाव की रणनीति है। जहां तक सामाजिक प्रभाव की बात है तो होली अब हुड़दंग या सांस्कृतिक एजेंडे से जोड़कर देखी जाती है, जो सामूहिकता को राजनीतिक लाभ में बदल देती है। यह प्रेम-एकता का संदेश देने के बजाय धार्मिक भावनाओं को उकसाने का माध्यम बन चुका है।


खासकर नेताओं द्वारा होली पर रंग लगाने की परंपरा अब आधुनिक राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बन चुका है, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा शुरू की गई पौराणिक रंग खेलने की प्रथा से अभिप्रेरित है। वर्तमान दौर में यह जनता से सीधा जुड़ाव बनाने और निज छवि सुधारने की रणनीति के तौर पर देखा जाने लगा है। पौराणिक आधार पर यदि गौर फरमाएं तो रंग लगाने की परंपरा द्वापर युग से कृष्ण-राधा लीला से जुड़ी है, जहां कृष्ण ने अपनी मां यशोदा के सुझाव पर राधा को रंग लगाकर समानता का संदेश दिया। इसलिए ब्रज क्षेत्र में यह प्रथा लोकप्रिय हुई, जो बाद में पूरे भारत में फैली है।


प्राचीन काल में प्राकृतिक रंग जैसे टेसू के फूलों से शुरू हुई यह परंपरा सामाजिक एकता का प्रतीक बनी। बाद में राजनीतिक लोगों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया।आजादी के बाद नेताओं ने इसे चुनावी लाभ के लिए अपनाया; पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी बाजपेयी से लेकर वर्तमान नेता जैसे नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ तक रंग खेलकर जनसंपर्क बढ़ाने की परंपरा अनवरत रूप से जारी है। तमाम वृत्तांत पढ़े देखे सुने जा सकते हैं। 2026 में बिहार, यूपी में राज्यसभा चुनावों के दौरान चिराग पासवान जैसे नेताओं ने इसे वोटर जुड़ाव के हथियार बनाया। यह हिंदुत्व एजेंडे को मजबूत करने और ध्रुवीकरण का माध्यम भी बन गया।


जहां तक सामाजिक प्रभाव की बात है तो यह परंपरा दुश्मनी भुलाने का संदेश देती है, लेकिन सियासत में ध्रुवीकरण बढ़ाती है। नेताओं के रंग लगाने से पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ता है, पर सांप्रदायिक विवाद भी जन्म लेते हैं। होली भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता, प्रेम और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह वसंत ऋतु के आगमन के साथ नई शुरुआत और सामूहिक आनंद का उत्सव है। इससे सामाजिक एकता मजबूत होती है। 


सच कहूं तो रंगों की होली जाति, वर्ग और लिंग की बाधाओं को तोड़ती है, जहां सभी एक-दूसरे को गले लगाते हैं और पुरानी कटुता भुला देते हैं। खासकर ब्रज की लठमार होली जैसी परंपराएं महिलाओं की सशक्तता और कृष्ण-राधा के प्रेम को दर्शाती हैं। यह भाईचारा और सौहार्द्र का संदेश देती है। जहां  तक आध्यात्मिक महत्व की बात है तो होलिका दहन अधर्म पर धर्म की विजय दिखाता है, जो प्रह्लाद की भक्ति से प्रेरित है। यह हिरण्यकश्यप की पुत्र प्रताड़ना से मुक्ति का पर्व है। 


वाकई, होली के रंगों में प्रेम (लाल), ज्ञान (पीला) और समृद्धि (हरा) के प्रतीक हैं, जो अद्वैत की भावना जगाते हैं। कृष्ण की लीला से जुड़ी यह भक्ति और आनंद का संगम है। इसमें कृषि और पर्यावरण के लिए भी संदेश है। फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है, जहां होलिका में पौधे भेंट किए जाते हैं। इसके उल्लास से मानसिक स्वास्थ्य सुधारता है और सामूहिक शुद्धि का माध्यम बनता है।


- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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