Jammu Kashmir Assembly में जबरदस्त हंगामा, NLU की माँग और कश्मीरियों की सुरक्षा के मुद्दे पर गरमाई राजनीति

By नीरज कुमार दुबे | Feb 03, 2026

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज का दिन तीखे राजनीतिक टकराव, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों के बीच गुज़रा। एक ओर जहां विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जम्मू क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) की स्थापना की जोरदार मांग उठाई, वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने केंद्र शासित प्रदेश के बाहर कश्मीरियों के कथित उत्पीड़न के मामलों को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। इन समानांतर मुद्दों ने सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह माहौल गरमा दिया।

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हंगामे के बीच भी विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राठेर ने प्रश्नकाल जारी रखा। इसी दौरान पीडीपी विधायक वहीद-उर-रहमान पारा ने देश के विभिन्न हिस्सों में कश्मीरियों के खिलाफ कथित “घृणा अपराध” की घटनाओं पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव रखा, जिसे अध्यक्ष ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ऐसे मुद्दे प्रश्नकाल बाधित किए बिना अन्य संसदीय माध्यमों से उठाए जा सकते हैं।

सदन के भीतर नेकां विधायक मुबारक गुल और सैफुल्लाह मीर ने आरोप लगाया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कश्मीरी छात्रों, व्यापारियों और कामगारों को उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। मीर ने कहा कि कुछ जगहों पर कश्मीरियों को अपने आवासों से बाहर निकलने में भी डर लग रहा है और यह स्थिति चिंताजनक है। पीडीपी के पारा ने भी इस विषय पर तत्काल चर्चा की जरूरत बताते हुए कहा कि बढ़ती घटनाएं कश्मीरियों में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही हैं और सरकार को सक्रिय कदम उठाने चाहिए।

उधर, सदन के भीतर उठ रहे इन मुद्दों की गूंज विधानसभा परिसर के बाहर भी सुनाई दी। सत्र शुरू होने से पहले नेकां के विधायकों ने राज्य का दर्जा बहाल करने और कश्मीरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन किया। उनके हाथों में “राज्य का दर्जा और संवैधानिक गारंटी बहाल करो” तथा “जम्मू-कश्मीर के बाहर कश्मीरियों को परेशान करना बंद करो” जैसे पोस्टर थे। नेकां नेताओं ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया गया था और अब उस वादे को पूरा करने का समय आ गया है। पार्टी विधायक तनवीर सादिक ने कहा कि सभी सदस्य इस विरोध में एकजुट हैं और यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि जनता की भावना का सवाल है। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से अपील की कि वे राज्यों को निर्देश दें ताकि वहां रह रहे कश्मीरियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

देखा जाये तो आज के घटनाक्रम साफ संकेत देते हैं कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन, पहचान और सुरक्षा के मुद्दे अभी भी केंद्रीय भूमिका में हैं। जम्मू के लिए शैक्षणिक संस्थानों की मांग जहां क्षेत्रीय विकास की आकांक्षा को दर्शाती है, वहीं कश्मीरियों की सुरक्षा और राज्य का दर्जा बहाली का प्रश्न राजनीतिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर गूंज रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या सदन के भीतर उठी आवाजें नीतिगत फैसलों में तब्दील हो पाती हैं या नहीं।

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