By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 06, 2026
देश के बिजली उत्पादन क्षेत्र में कृत्रिम मेधा (एआई) का उपयोग वर्ष 2030 तक 35 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है और यह संचालन क्षमता का मुख्य आधार भी बन जाएगा। एक अध्ययन रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। ‘द एनर्जी एंड क्लाइमेट इनिशिएटिव सोसायटी’ (ईएनसीआईएस) के अध्ययन के मुताबिक, फिलहाल करीब 35 प्रतिशत बिजली उत्पादक कंपनियों ने अपने मुख्य परिचालन में एआई को अपनाया हुआ है और यह संख्या तेजी से बढ़ने का अनुमान है।
डेटा सेंटर की क्षमता 2025 के 1.5 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक सात गीगावाट होने का अनुमान है, जबकि केवल डेटा सेंटर से बिजली की मांग 2031-32 तक 13.56 गीगावाट तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, अदाणी और रिलायंस जैसे बड़े समूह वर्ष 2035 तक एआई आधारित बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा में 210 अरब डॉलर से अधिक निवेश की प्रतिबद्धता जता चुके हैं, जो स्मार्ट और टिकाऊ ऊर्जा की दिशा में बदलाव को दर्शाता है। अध्ययन से पता चलता है कि एआई के उपयोग में भविष्यवाणी-आधारित परिसंपत्ति प्रबंधन और सक्रिय रखरखाव सबसे अहम क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं।
आधे से अधिक लोगों ने कहा कि इससे खराबी का पहले पता लगाने, बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटनाएं कम करने और उपकरणों की उम्र बढ़ाने में मदद मिलेगी। ईएनसीआईएस की ‘भारत इलेक्ट्रिसिटी काउंसिल’ के मानद चेयरमैन भूपिंदर सिंह भल्ला ने कहा, “वर्ष 2030 तक निर्णायक फासला पारंपरिक और नवीकरणीय ऊर्जा के बीच नहीं, बल्कि सीखने वाली और केवल संचालन करने वाली परिसंपत्तियों के बीच होगा।” ईएनसीआईएस एक से तीन सितंबर तक राष्ट्रीय राजधानी में ‘भारत इलेक्ट्रिसिटी, पावरजेन इंडिया और इंडियन यूटिलिटी वीक’ का आयोजन कर रहा है। इसमें 15,000 से अधिक पेशेवरों, 30 से ज्यादा देशों के करीब 250 प्रदर्शकों और 150 उद्योग विशेषज्ञों एवं नीति-निर्माताओं के शामिल होने की उम्मीद है।