बीजेपी के 100 से कम सीटें जीतने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर का सर्वे कह रहा- हार रहीं ममता!

By अभिनय आकाश | Mar 31, 2021

पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के लिए 1 अप्रैल यानी कल वोट डाले जाएंगे। इन सब के बीच सबकी नजर नंदीग्राम पर टिकी हैं। बंगाल में पहले लोगों की नजर कोलकाता में रहती थी कि राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं। लेकिन इस बार के पूरे बंगाल चुनाव का एपिसेंटर नंदीग्राम हो गया। जिस नंदीग्राम ने ममता को राजनीति के गलियारों तक पहुंचाया और सत्ता का स्वाद भी चखाया। उसी नंदीग्राम में तृणमूल बैकफुट पर नजर आ रही है। ममता बनर्जी के घनिष्ठ सहयोगी और नंदीग्राम आंदोलन के अगुवा शुभेंदु अधिकारी के टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद से लगातार नंदीग्राम में टीएमसी और बीजेपी में हिंसक संघर्ष भी बढ़ गए हैं और सियासी आरोप-प्रत्यारोप भी अपने चरम पर है। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि क्या ममता बनर्जी नंदीग्राम विधानसभा सीट हार रही हैं?

100 के पार गई बीजेपी तो ये काम छोड़ दूंगा

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ये दावा किया था कि बंगाल चुनाव में टीएमसी की जीत निश्चित है। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि अगर बीजेपी 100 सीटों का आंकड़ा पार करती है तो वो राजनीतिक रणनीतिकार का काम छोड़ देंगे। प्रशांत किशोर ने कहा था कि राज्य के कुछ हिस्सों में टीएमसी के खिलाफ गुस्सा हो सकता है लेकिन अभी भी ममता बनर्जी ही सबसे बड़ा और विश्वसनीय चेहरा हैं। 

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पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर 2014 के चुनाव के बाद सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी के पॉलिटिकल कैंपेन का जिम्मा संभाला था। प्रचंड मोदी लहर ने प्रशांत किशोर को एक पहचान दी और वो बिगड़ते समीकरण की पहचान रखने वाले चुनावी मैनेजर के रूप में उभर कर सामने आएं। हालांकि ऐसा नहीं है कि हर बार उनका अंदेशा राजनीति में सटीक ही बैठा। ये किशोर ही थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा का गठजोड़ करा यूपी को साथ पसंद है का नारा दिया। लेकिन जनता से कांग्रेस को सात सीटें प्राप्त हुई। बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव को साथ लाकर महागठबंधन बनवाया। लेकिन इन सब के बीच एक चीज जो साफ प्रतीत होती है कि प्रशांत किशोर का मैनेजमेंट तभी कारगर सिद्ध होता है जब उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति विशेष को मैनेज करना हो जो जनता के बीच लोकप्रिय हो। वहीं अगर उन्हें कोई अलोकप्रिय प्रोडक्ट सौप दिया जाए तो वह उसे जनता के बीच स्थापित कर पाने में असफल हो जाते हैं।  

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