प्रशांत किशोर अनुभवी रणनीतिकार, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में हार के बाद ममता की किस्मत बदल दी

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | May 02, 2021

कोलकाता। मीडिया में कभी-कभार आने वाले साक्षात्कार को छोड़कर वह आम तौर पर अपने चुनावी वार रूम में चुपचाप काम करते हैं या पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के जमावड़े के बीच बैठकर धैर्य के साथ उनकी बातें सुनते हैं। इसके बावजूद प्रशांत किशोर को अक्सर चुनावी खेल में पार्टियों के अग्रणी नेताओं की जीत में ‘मैन ऑफ द मैच’ का ‘खिताब’ दिया जाता है। पश्चिम बंगाल भी इसका अपवाद नहीं है। उन्होंने पिछले साल दिसंबर में ट्वीट किया था, ‘‘वास्तव में बीजेपी पश्चिम बंगाल में दो अंकों को पार करने के लिए संघर्ष करेगी’’ और उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई। उन्होंने कहा था, ‘‘अगर बीजेपी इससे बेहतर करती है, तो मैं यह स्थान छोड़ दूंगा।’’

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प्रशांत किशोर ने यह महसूस किया कि निचले स्तर पर कई टीएमसी नेताओं को लेकर लोगों में गुस्सा है, और उन पर अक्सर जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं।ऐसे में किशोर ने ‘दीदी के बोलो’ या (दीदी को बताओ) अभियान के तहत नागरिकों से सीधे संपर्क किया, जिसके तहत नागरिक सीधे ममता बनर्जी से शिकायत कर सकते थे। राजनीतिक विश्लेषक और कलकत्ता शोध समूह के सदस्य रजत रॉय ने कहा, ‘‘पीके का कार्यक्रम लोकप्रिय हुआ और इसने एक सुरक्षा वाल्व के रूप में काम किया।’’ किशोर चुनावी रणनीतियों को सफलतापूर्वक तैयार करने का अनुभव रखते हैं, जिसमें 2014 में नरेंद्र मोदी का पहला प्रधानमंत्री अभियान भी शामिल है, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

किशोर ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 2015 के अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया और इसके बाद पंजाब में कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनाव जिताने में मदद की। इसके बाद उन्होंने साबित किया कि वह चुनावी रणनीति के मास्टर हैं और 2019 में आंध्र प्रदेश की सत्ता में आने के लिए वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी की मदद की। उन्होंने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल को भी सलाह दी थी। मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज, कोलकाता के पूर्व प्रमुख रणवीर समददार ने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय थीं। महिलाओं के लिए लाभकारी पहलों ने अपना अच्छा असर दिखाया... उनके अधिक वोट पाने में मदद मिली।’’

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में भाजपा के जोरदार चुनाव अभियान ने किशोर को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने पर मजबूर किया। इस बार उनका जवाब था, ‘‘बांग्ला निजेर मेय के चॉय’’ यानी बंगाल अपनी बेटी को चाहता है। इसके बाद बनर्जी ने बांग्ला बनाम बाहरी की बहस को तेज करते हुए बंगाली उप-राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया। यह किशोर ही थे, जिन्होंने भाजपा की विशाल चुनावी सेना के खिलाफ बनर्जी के अभियान को एक बड़ी सफलता दिलाने का रास्ता तैयार किया।

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