Pregnancy के Third Trimester में Iron क्यों है सबसे जरूरी? Expert से जानें इसके फायदे

By दिव्यांशी भदौरिया | Mar 17, 2026

प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को अपनी हेल्थ पर ध्यान काफी जरुरी माना जाता है। गौरतलब है कि गर्भावस्था की हर तिमाही में आयरन की जरूरत होती है। आयरन एक बहुत ही जरुरी पोषक तत्व माना जाता है। क्योंकि प्रेग्नेंसी के समय प्रेग्नेंट महिला के शरीर में खून की मात्रा 50 फीसदी की वृद्धि को पूरा करने, भ्रूण और प्लेसेंटा को ऑक्सीजन सप्लाई करने और एनीमिया यानी खून की कमी को रोकने के लिए आयरन बहुत जरूरी तत्व है। इतना ही नहीं, गर्भ में पल रहे शिशु को पर्याप्त मात्रा में आयरन की जरुरत होती है और क्योंकि इससे शिशु के मस्तिष्क का विकास होता है। अगर किसी गर्भवती महिला के शरीर में आयरन की कमी हो जाती है, तो प्री-टर्म बर्थ, जन्म के समय शिशु का वजन कम होने और प्रसवोत्तर थकान खतरा बढ़ जाता है। अब ज्यादातर लोगों के मन में सवाल आता है कि प्रेग्नेंसी के किस चरण में महिलाओं को सबसे ज्यादा आयरन की जरुरत होती है। 

किस तिमाही में महिलाओं को सबसे ज्यादा आयरन लेना चाहिए?

गर्भावस्था के दौरान हर चरण में आयरन जरूरी होता है, लेकिन तीसरी तिमाही में इसकी आवश्यकता सबसे अधिक बढ़ जाती है। एक्सपर्ट के अनुसार, इस समय महिलाओं को सामान्य से करीब 50% ज्यादा (लगभग 27 mg प्रतिदिन) आयरन की जरूरत होती है, ताकि शिशु का विकास सही ढंग से हो और शरीर में बढ़ते रक्त की पूर्ति हो सके। खासकर अंतिम हफ्तों में अतिरिक्त आयरन लेना अधिक फायदेमंद माना जाता है।

आखिरी तिमाही में आयरन लेने के फायदे

- एनीमिया के जोखिम में कमी- प्रेग्नेंसी की आखिरी तिमाही में मतलब है कि डिलीवरी कभी हो सकती है। यदि डिलीवरी के दौरान महिला को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो जाती है या गर्भवस्था के दौरान महिला के शरीर में आयरन की कमी होती है, जिससे महिलाओं को एनीमिया हो सकता है। 

  - डिलीवरी की तैयारी- आखिरी तिमाही में भरपूर मात्रा में आयरन लेने से शरीर डिलीवरी के लिए तैयार रहता है। वैसे भी नॉर्मल डिलीवरी हो या सिजोरियन डिलीवरी। दोनों ही स्थिति में महिला के शरीर से ब्लड बहता है। इसलिए आयरन लेने से शरीर में ब्लड वॉल्यूम बढ़ता है, जो बाद में रिकवरी में मदद करता है। 

-शिशु के वजन पर असर- प्रेग्नेंसी के आखिरी तिमाही में पर्याप्त मात्रा में आयरन लेने से शिशु का मानसिक विकास बेहतर रहता है। इसके साथ ही जन्म के समय शिशु का वजन भी सही रहता है। यहां तक कि प्री-टर्म डिलीवरी का जोखिम भी कम रहता है। 

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