Yes Milord: ब्रेस्ट दबाना, सलवार उतारना...रेप की कोशिश नहीं, HC के इतना कहते ही भड़क गए CJI

By अभिनय आकाश | Jul 18, 2026

महिला के ब्रेस्ट दबाना, सलवार उतारना, रेप की कोशिश नहीं। पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने रेप की कोशिश की। कानूनी परिभाषा को लेकर देश भर में नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा कि किसी महिला को कमरे में बंद करना, उसकी छाती दबाना और सलवार उतारने की कोशिश करना अपने आप में आईपीसी की धारा 376/51 के तहत बलात्कार का प्रयास साबित नहीं करता। जब तक यह साबित ना हो जाए कि आरोपी ने बलात्कार को अंजाम देने की दिशा में स्पष्ट और प्रत्यक्ष कदम उठाया था। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कहा कि आरोपी का व्यवहार गंभीर था और यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य है जो आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है। 9 जुलाई को फैसला सुनाते हुए बांका के हिमांशु उर्फ मिथिया पाठक को बरी कर दिया। पटना हाई कोर्ट के इस फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट खफा हो गया है। पटना हाई कोर्ट के इस फैसले को 14 जुलाई को सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में उठाया। जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हैरानी जताते हुए नाराजगी जाहिर की। चीफ जस्टिस ने कहा कि जजों को संवेदनशील होना चाहिए और सर्च करनी चाहिए। जज कानूनी पड़ताल के बिना फैसले दिए जा रहे हैं। हम पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तार से समीक्षा करके विस्तृत आदेश जारी करेंगे।

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आरोपी पर क्या आरोप थे?

बांका ज़िले के अमरपुर में 'छाया स्टूडियो' में एक दिन पहले हुई घटना के संबंध में 20 जनवरी, 2008 को FIR दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि स्टूडियो के मालिक पाठक ने पीड़िता को फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अंदर बुलाया और उसके पिता से कहा कि वे कंप्यूटर मॉनिटर पर तस्वीर देखने के लिए बाहर इंतज़ार करें। इसके बाद आरोपी ने स्टूडियो का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। पीड़िता ने बयान दिया कि आरोपी ने अपने कपड़े उतारे, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और रेप करने के इरादे से उसकी छाती दबाकर ज़बरदस्ती छेड़छाड़ की। उसकी चीखें सुनकर पीड़िता के पिता ने ज़ोर लगाकर दरवाज़ा खोला; तब आरोपी ने उन्हें ज़ोर से धक्का दिया और भाग गया। 2013 में एक ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 (रेप की कोशिश) और धारा 342 (गलत तरीके से कैद में रखना) के तहत दोषी ठहराया और उसे तीन साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई। सबूतों की दोबारा जांच करने पर, हाई कोर्ट को प्रक्रिया में बड़ी कमियां मिलीं। कोर्ट ने देखा कि पांच गवाहों में से एकमात्र स्वतंत्र स्थानीय गवाह अपने बयान से मुकर गया था, और जांच करने वाले अधिकारी, जिन्होंने जांच पूरी की थी और चार्ज-शीट दाखिल की थी, उनसे ट्रायल के दौरान पूछताछ नहीं की गई थी। इसके अलावा, किसी मेडिकल ऑफिसर से भी पूछताछ नहीं की गई, जिसके बारे में कोर्ट ने कहा कि इससे रेप की कोशिश के आरोप को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं मिल पाया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि पीड़िता के माता-पिता "इंटरेस्टेड विटनेस" (मामले में दिलचस्पी रखने वाले गवाह) थे, इसलिए उनके बयानों की बारीकी से जांच और स्वतंत्र पुष्टि की ज़रूरत थी, लेकिन ये दोनों ही चीज़ें नहीं की गई थीं। हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी ने आपराधिक बल का इस्तेमाल किया था क्योंकि उसने पीड़िता को बंधक बनाया, दरवाज़ा बंद किया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर उसके साथ छेड़छाड़ की। हालाँकि, ये हरकतें रेप की कोशिश के बजाय महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध के दायरे में आती हैं। कोर्ट ने कहा, अगर पेनिट्रेशन का ज़रा भी सबूत न हो, या रेप की कोशिश साबित करने वाली कोई साफ़ हरकत न दिखे, और न ही कोई मेडिकल पुष्टि हो, तो IPC की धारा 375 और उसके साथ पढ़ी जाने वाली IPC की धारा 376 और 511 के तहत अपराध नहीं बनता है। कोर्ट का मानना ​​था कि अगर अभियोजन पक्ष की बात को पूरी तरह मान भी लिया जाए, तो भी FIR में बताए गए और पीड़िता के बयान में कही गई बातें, रेप की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए साफ़ तौर पर काफ़ी नहीं हैं।

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