UP में ना राहुल की दिलचस्पी है, ना सोनिया की, अकेले क्या कर पाएंगी प्रियंका ?

By अजय कुमार | Sep 10, 2019

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के हौसलों को उड़ान नहीं मिल पा रही है। प्रियंका वाड्रा गांधी की तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेसी लगातार मिलती हार से उबर नहीं पा रहे हैं। कांग्रेस के छोटे−बड़े नेताओं ने मायूसी की चादर ओढ़ रखी है तो कार्यकर्ताओं ने भी हवा का रूख भांप कर अपने आप को 'समेट' लिया है। कांग्रेस के सामने समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस में जान फूंकने वाले उसके तमाम दिग्गज नेता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां से वह कांग्रेस के पक्ष में बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं कर सकते हैं। इन बुजुर्ग नेताओं के पास न तो अब इतनी इच्छाशक्ति बची है कि वह जनता के बीच जाकर कांग्रेस की विचारधारा को प्रचार−प्रसार कर सकने की क्षमता है और ना ही इन नेताओं के पास किसी बड़े आंदोलन को लम्बे समय तक चलाने की शारीरिक ताकत है। रही सही कसर राहुल गांधी के अमेठी से वानयाड पलायन ने पूरी कर दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की रायबरेली संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी भी राज्य में कभी नहीं दिखाई देती हैं।

 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की समस्या यह है कि उसके आलाकमान ने कभी इस ओर जोर ही नहीं दिया कि यहां नेताओं की नई पौध तैयार की जाए। इसी तरह से यूपी के पुराने कांग्रेसी नेता भी अपनी सियासी चमक बचाए रखने के लिए नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने से कतराते रहे। एक तरफ कांग्रेस बुर्जुग नेताओं से पटी पड़ी है तो दूसरी तरफ उसके लिए संकट यह भी है कि उसके कई दिग्गज नेता जिनके बल पर कांग्रेस यूपी में मजबूती हासिल किए हुए थी, कांग्रेस का दामन छोड़कर अन्य दलों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

इसे भी पढ़ें: मुलायम बड़ी उम्मीद से आजम के साथ खड़े हुए थे, पर अखिलेश ने फिर साथ नहीं दिया

यूपी कांग्रेस की प्रमुख और बुजुर्ग लीडरशिप की बात की जाए तो कभी दिग्गज सलमान खुर्शीद, राज बब्बर, श्रीप्रकाश जायसवाल, पीएल पुनिया, राशिद अलवी, प्रमोद तिवारी, जफर अली नकवी, निर्मल खत्री, रतना कुमारी सिंह, प्रदीप कुमार जैन, आरपीएन सिंह, पूर्व मंत्री रामलाल राही, पूर्व विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर, अजय राय, जितिन प्रसाद, अनु टंडन, कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार 'लल्लू' और राजेश मिश्रा आदि जनाधार वाले नेता चुनावी बाजी पलटने की हैसियत रखते थे, लेकिन अब इसमें से कई बढ़ती उम्र के कारण तो कुछ शीर्ष नेतृत्व के ढीलेपन के चलते घरों में कैद होकर रह गए हैं। इसी प्रकार से दिग्गज कांग्रेस नेता संजय सिंह ने पार्टी छोड़ दी है तो आम चुनाव के समय जितिन प्रसाद के भी पार्टी छोड़ने की चर्चा जोर-शोर से चल चुकी है। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पहचान इमरान मसूद जैसे विवादित नेता बने हुए हैं जो मोदी के बारे में विवादित बयान देते रहते हैं और गांधी परिवार चंद मुस्लिम वोटों के लिए ऐसे नेताओं को संरक्षण देता है।

 

दमदार नेताओं की कमी के कारण कांग्रेस को आयातित नेताओं का सहारा लेना पड़ता है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस को दयनीय हालात से उबारने के लिए पार्टी महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका वाड्रा कोई नया करिश्मा कर पाएंगी, इस बात की उम्मीद काफी कम है। आम चुनाव से पूर्व प्रियंका ने जब यूपी की जिम्मेदारी संभाली थी तब कांग्रेसियों में जो उत्साह दिखा था, वह समय के साथ फीका पड़ता जा रहा है। इसी लिए तो सोनभद्र और उन्नाव के माखी कांड को लेकर हुए प्रदर्शन में जिन कांग्रेसियों ने काफी सक्रियता दिखाई थी, वह बिजली दरों में बढ़ोत्तरी के खिलाफ प्रियंका के आंदोलन में हुंकार भरते नहीं दिखाई दिए। प्रियंका वाड्रा ने बिजली दरों में बढ़ोत्तरी के खिलाफ प्रदेश भर में चार दिन के जन−आंदोलन की घोषणा की थी, जो कमजोर संगठन और निराश नेताओं के चलते दम तोड़ गया।

 

खैर, तमाम किन्तु−परंतुओं से आगे बढ़कर देखा जाए तो यूपी में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा भले कमजोर हो, उसके नेताओं में सक्रियता का अभाव हो, मगर कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका वाड्रा 'अर्जुन' की तरह 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर नजर लगाए हुए हैं। प्रियंका अपने बयानों और सक्रियता में कहीं पीछे नहीं हैं। सरकार के खिलाफ जो भी मुद्दा उनके हाथ लगता है उसे वह पूरी शिद्दत से उठाती हैं। पिछले कुछ मामलों में उन्हें सफलता मिली भी है। इसी तरह प्रियंका ने हाल ही में सरकार द्वारा बिजली दरों में की गई वृद्धि के खिलाफ आंदोलन का निर्णय लिया था, लेकिन वह उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चला। वह चाहती थीं कि कांग्रेस के इस आंदोलन के साथ जनता भी जुड़े। इसके लिए 06 सिंतबर 2019 (शुक्रवार) को हर जिले के प्रमुख बाजारों में लालटेन जुलूस, फिर 07−08−09 सितंबर 2019 को ब्लॉक स्तर तक हस्ताक्षर अभियान चलाने का निर्देश दिया था।

इसे भी पढ़ें: प्रियंका ने UP में मोर्चा तो संभाल लिया है लेकिन कार्यकर्ताओं की सेना तो है नहीं

प्रियंका के निर्देश पर कांग्रेसियों ने एक−एक सांकेतिक जुलूस तो निकाल दिया लेकिन उसके बाद हस्ताक्षर अभियान को लेकर पार्टीजनों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यूपी की बात तो दूर लखनऊ तक में प्रियंका के आह्वान पर कहीं कोई माहौल नजर नहीं आया। इतने गंभीर विषय पर भी जनता को कांग्रेस नहीं जोड़ सकी।

 

उधर, जानकार उत्तर प्रदेश कांग्रेस के बिजली के दामों में बढ़ोत्तरी के खिलाफ चलाए गए आंदोलन के फ्लॉप होने की वजह गिनाते इसे टाइमिंग से जोड़ रहे हैं। वह कहते हैं कि कांग्रेस संगठन में परिवर्तन की हलचल तीन माह से चल रही है लेकिन अब तक निर्णय नहीं हो सका है। सभी जिला कमेटियां भंग पड़ी हैं। ऐसे में प्रियंका का बिजली दरों में बढ़ोत्तरी के खिलाफ चलाया गया आंदोलन फ्लॉप होना निश्चित था। प्रियंका को अगर कांग्रेस में नई ऊर्जा भरनी है तो उन्हें पहले सभी पदों को भरने और जिला कमेटियों का गठन करना चाहिए था। ताकि नेताओं की जिम्मेदारी तय हो सके। इसके अलावा प्रियंका को बुजुर्ग कांग्रेसियों पर भरोसा करने की बजाए ऐसे युवाओं और महिलाओं को आगे लाना होगा जो नेतृत्व क्षमता रखते हों और जिनकी छवि साफ−सुथरी हो।

 

-अजय कुमार

 

All the updates here:

प्रमुख खबरें

US Trade Deal से पहले भारत ने चल दिया था अपना दांव, Budget और Labour Codes से इकोनॉमी को बनाया फ्यूचर प्रूफ

काली पड़ गई है चांदी? इन 3 घरेलू तरीकों से मिनटों में पाएं अपने Silver Ornaments पर नई Shine

Pune Land Deal: चार्जशीट में Parth Pawar का नाम नहीं, जानें EOW की जांच में कौन-कौन फंसा

Budget Session: Lok Sabha में INDIA ब्लॉक का जोरदार हंगामा, नारेबाजी के बाद कार्यवाही स्थगित