By प्रेस विज्ञप्ति | Jun 02, 2022
कोलकाता। बंगीय हिंदी परिषद, कोलकाता द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद को संबोधित करते हुए भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि आलोचना रचना का प्रतिपक्ष नहीं होती है। किसी भी आलोचक का निष्पक्ष होना सबसे जरूरी है। 'स्वातंत्र्योत्तर हिंदी आलोचना : विविध परिदृश्य' विषय पर आयोजित इस परिसंवाद में डॉ. मृत्युंजय पांडेय, प्रो. कृपाशंकर चौबे, डॉ. रणजीत कुमार एवं डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने भी हिस्सा लिया।
बंगीय हिंदी परिषद के निदेशक डॉ. रणजीत कुमार ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी ने हिंदी आलोचना की जिस रीढ़ को तैयार किया था, उसे आचार्य नंददुलारे वाजपेयी से लेकर डॉ. नागेंद्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, रमेश कुंतल मेघ, विजयानंद त्रिपाठी और मैनेजर पांडेय समेत कई महान आलोचकों ने एक सुदृढ ढांचा प्रदान किया। उसकी बाद की पीढ़ी ने उसे सजाया संवारा और आज की वर्तमान पीढ़ी उसे एक नई धार देने का प्रयास कर रही है। आयोजन में स्वागत भाषण बंगीय हिंदी परिषद के मंत्री डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने दिया। कार्यक्रम का संचालन परिषद की उप-निदेशक सुश्री प्रियंका सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन साहित्य मंत्री श्री राजेश सिंह ने दिया।