By रेनू तिवारी | Sep 21, 2026
भारत की धरती से 1952 में विलुप्त घोषित हो चुके चीतों ने चार साल के भीतर शानदार वापसी की है। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से लाए गए 8 चीतों के साथ शुरू हुआ 'प्रोजेक्ट चीता' अब केवल जानवरों को फिर से बसाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सफलता की एक नई कहानी लिख रहा है। चार सालों के इस ऐतिहासिक सफर में भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 हो गई है, जिनमें से 32 चीतों का जन्म भारत की ही धरती पर हुआ है। वर्तमान में मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में 49 और गांधी सागर अभयारण्य में 3 चीते मौजूद हैं। ये दोनों ही मध्य प्रदेश में स्थित हैं। इस प्रोग्राम ने 17 सितंबर को चार साल पूरे कर लिए हैं। यह सफ़र नामीबिया से आठ जंगली चीतों के आने के साथ शुरू हुआ था।
अधिकारियों ने बताया कि टीम को पहले साल में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा और नए माहौल में चीतों के व्यवहार, स्वास्थ्य और प्रबंधन को समझने का अनुभव मिला। यह सीख तब बहुत काम आई जब प्रोग्राम री-इंट्रोडक्शन से आगे बढ़कर ब्रीडिंग और आबादी बढ़ाने के चरण में पहुंचा।
विलुप्ति से वापसी तक
1952 में भारत में चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, इसलिए उनकी वापसी देश के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों का एक अहम अध्याय है। किसी प्रजाति के देश से गायब हो जाने के बाद उसे वापस लाना एक मुश्किल काम है, और 'प्रोजेक्ट चीता' ने री-इंट्रोडक्शन और ब्रीडिंग प्रोग्राम के ज़रिए इस खोई हुई मौजूदगी को फिर से बहाल करने की कोशिश की है।
वन्यजीवों के लिए चीते क्यों ज़रूरी हैं?
चीते वन्यजीव इकोसिस्टम में शिकारी के तौर पर अहम भूमिका निभाते हैं और शाकाहारी जानवरों की आबादी का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। वे मुख्य रूप से हिरण, चिंकारा, इम्पाला और गज़ेल जैसे छोटे और मध्यम आकार के शाकाहारी जानवरों का शिकार करते हैं। इन आबादी को नियंत्रित रखकर, चीते जैसे शिकारी जंगल के इकोसिस्टम का संतुलन बनाए रखने में योगदान देते हैं।
ट्रॉफिक कैस्केड (खाद्य श्रृंखला में बदलाव का असर) क्या है?
शाकाहारी जानवरों की आबादी बढ़ने से घास और अन्य वनस्पतियों पर ज़्यादा दबाव पड़ सकता है क्योंकि जानवर ज़्यादा बड़े इलाके में चरते हैं। इससे मिट्टी का कटाव हो सकता है और पौधों की विविधता कम हो सकती है, जिससे पूरा इकोसिस्टम कमज़ोर हो सकता है। ऐसे बदलावों का असर आखिरकार दूसरी प्रजातियों पर पड़ सकता है और इसके नतीजे वन्यजीवों से भी आगे तक जा सकते हैं। इस आपस में जुड़े असर को, जिसमें किसी एक प्रजाति के गायब होने या बढ़ने से पूरी फ़ूड चेन पर असर पड़ता है, 'ट्रॉफिक कैस्केड' कहा जाता है।
शावकों के ज़िंदा रहने से लेकर नई पीढ़ी तक
दूसरे साल में भारत में पैदा हुए शावकों के ज़िंदा रहने और उनके विकास पर ध्यान दिया गया। चार साल की स्थिति की समीक्षा के अनुसार, जन्म के बाद 13 शावक एक साल से ज़्यादा समय तक ज़िंदा रहे। इस प्रोग्राम में ब्रीडिंग करने वाली मादाओं की स्थापना और दूसरी पीढ़ी के शावकों के ज़िंदा रहने की घटनाएं भी देखी गईं, जिन्हें अधिकारियों ने बड़ी कामयाबी बताया।
आंकड़े एक बड़ी कहानी बताते हैं। नामीबिया से लाए गए आठ चीतों में से तीन ज़िंदा हैं। भारत में पैदा हुए 22 शावकों के साथ, नामीबिया में जन्मे ज़िंदा चीते और उनकी संतानें मिलाकर कुल 25 जानवर हैं। 18 फरवरी, 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते लाए गए। उनमें से आठ ज़िंदा हैं, जबकि भारत में 10 शावक पैदा हुए हैं। दक्षिण अफ्रीका से आए ज़िंदा चीते और उनकी संतानें मिलाकर कुल 18 जानवर हैं।
चीते बाड़ों से बाहर निकले
तीसरा साल इस प्रोग्राम का एक और अहम पड़ाव था, क्योंकि 2025 में चीतों को खुले जंगल वाले इलाकों में छोड़ा गया। अधिकारियों ने बताया कि 12 ज़िलों में फैले अंतर-राज्यीय इलाके में इन जानवरों पर चौबीसों घंटे नज़र रखी गई। जैसे-जैसे प्रोग्राम शुरुआती बाड़ों से आगे बढ़ा, वे धीरे-धीरे नए इलाकों के हिसाब से ढल गए।
कुनो में अभी मौजूद 49 चीतों में से 17 खुले जंगल में हैं, जिनमें 10 नर और सात मादा शामिल हैं। बाकी 32 'सॉफ्ट-रिलीज़' बाड़ों में हैं। इस ग्रुप में पांच नर, आठ मादा और एक साल से कम उम्र के 19 शावक शामिल हैं।
कुनो से गांधी सागर तक
इनकी वापसी कुनो नेशनल पार्क से आगे भी बढ़ गई है। अभी तीन चीते गांधी सागर सैंक्चुअरी में हैं, जो मध्य प्रदेश में एक और इलाके में इस प्रोग्राम के विस्तार को दिखाता है। नामीबिया से जानवरों के आने के साथ शुरू हुआ यह सफ़र अब भारत में एक और इलाके तक पहुँच गया है।
इस साल फरवरी में बोत्सवाना से नौ चीते लाए गए, जिससे भारत के चीता बहाली प्रोग्राम का अंतरराष्ट्रीय आधार और मज़बूत हुआ। अफ्रीका की अलग-अलग आबादी से जानवरों को लाना देश में लंबे समय तक चीतों की आबादी बनाने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है।
अगला अध्याय एक स्थायी आबादी बनाने के बारे में है।
प्रोजेक्ट चीता का अगला चरण अब सिर्फ़ जानवरों को दोबारा बसाने तक सीमित नहीं है। अब ध्यान सही आवासों को बढ़ाने और भारत में चीता की एक व्यापक, लंबे समय तक चलने वाली मेटा-आबादी बनाने पर है। कूनो से गांधी सागर और चीता के लिए उपयुक्त अन्य संभावित इलाकों तक विस्तार इसी लक्ष्य के अनुरूप है।
पहले आठ चीतों के आने के चार साल बाद, इस प्रोग्राम में 52 चीते दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 32 का जन्म भारत में हुआ है। अब चुनौती यह होगी कि उनके रहने की जगहों (हैबिटैट) को बढ़ाया जाए और साथ ही बड़े इलाके में उनके प्रजनन, जीवित रहने और नए माहौल में ढलने में मदद की जाए।
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