By Ankit Jaiswal | Oct 23, 2025
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें केंद्र सरकार से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आधारित तकनीकों को लेकर एक व्यापक नियामक और लाइसेंसिंग ढांचा तैयार करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता आरती साह ने कहा है कि खास तौर पर ऐसे एआई सिस्टम, जो वास्तविक लोगों की आवाज, तस्वीर या वीडियो की हूबहू नकल कर सकते हैं, उनके लिए तुरंत कानूनी व्यवस्था बनाना जरूरी है।
मौजूद जानकारी के अनुसार याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और दूरसंचार विभाग (DoT) को एक वैधानिक व्यवस्था बनाने का निर्देश देने की अपील की गई है, ताकि एआई तकनीकों का जिम्मेदाराना उपयोग सुनिश्चित हो सके और गूगल, मेटा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जवाबदेही तय हो सके। याचिकाकर्ता ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए बताया है कि यूरोपीय संघ, अमेरिका, चीन और सिंगापुर ने पहले से ही जोखिम आधारित वर्गीकरण, लेबलिंग और सख्त प्रवर्तन प्रणालियों की शुरुआत कर दी हैं।
गौरतलब है कि याचिका में सरकार की निष्क्रियता को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताया गया है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म डीपफेक शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं करते, जिससे पीड़ितों को राहत नहीं मिल पाती हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट के महत्त्वपूर्ण फैसलों जैसे पुट्टस्वामी केस (निजता अधिकार) और तहरीन पूनावाला केस (डिजिटल हिंसा रोकथाम) का हवाला देते हुए कहा गया है कि अब न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो गया है।
याचिका में तीन प्रमुख आदेशों की मांग की गई है। पहला, केंद्र सरकार को एआई तकनीकों पर व्यापक नियामक ढांचा तैयार करने का निर्देश दिया जाए। दूसरा, डिजिटल प्लेटफॉर्म को डीपफेक सामग्री हटाने के लिए पारदर्शी और समयबद्ध तंत्र बनाने को अनिवार्य किया जाए। और तीसरा, सरकार, तकनीक विशेषज्ञों, न्यायविदों और नागरिक समाज के सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए जो नैतिक एआई मानकों की सिफारिश कर सके। याचिका में चेतावनी दी गई है कि डीपफेक तकनीक कुछ ही क्षणों में व्यक्तियों, संस्थानों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती है और बिना तत्काल हस्तक्षेप के इसे चुनावों को प्रभावित करने तथा सामाजिक वैमनस्य फैलाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता हैं