Pune Grand Tour: 'घाटांचा राजा' बनने की जंग, खड़कवासला की चढ़ाई में होगी Cyclists की अग्निपरीक्षा।

By Ankit Jaiswal | Jan 20, 2026

पेशेवर साइक्लिस्ट आमतौर पर उन छोटी-छोटी चीज़ों पर नज़र रखते हैं जिन्हें आम दर्शक महसूस भी नहीं कर पाते हैं। जनवरी की ठंड में अचानक चढ़ती दोपहर की गर्मी, ग्रे डामर वाली सड़क पर टायरों की पकड़ और बदलती हवा की दिशा। लेकिन भारत की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय रोड साइक्लिंग प्रतियोगिता, पुणे ग्रैंड टूर में राइडर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती कुछ और ही है। कोंढणपुर से खड़कवासला झील तक का तीखा और लंबा चढ़ाई वाला सेक्शन ऐसा है, जो फेफड़ों की क्षमता और पैरों की ताकत की असली परीक्षा लेता है।


जैसे-जैसे रेस का कारवां पुणे में निर्णायक दिनों की ओर बढ़ रहा है, सवारों के बीच दूसरे स्टेज को लेकर चर्चा तेज़ होती जा रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, फिनिश लाइन से लगभग 15 किलोमीटर पहले एक ऐसा चढ़ाव आता है, जहां सड़क करीब 10 प्रतिशत तक ऊपर जाती है। नीदरलैंड्स टीम के डायरेक्टर मेंट बर्केनबोश का मानना है कि पूरे दिन की थकाऊ राइडिंग के बाद यह चढ़ाई किसी भी साइक्लिस्ट की सांसें रोक सकती है। स्थानीय साइक्लिंग हलकों में इस स्टेज के विजेता को अनौपचारिक तौर पर “घाटांचा राजा” कहा जाता है।


दिलचस्प बात यह है कि यूरोप से आए कई राइडर्स भारत की धूप को राहत की तरह देख रहे हैं। फ्रांस के साइक्लिस्ट पियरे चार्टियर कहते हैं कि वे कड़ाके की सर्दी से निकलकर यहां पहुंचे हैं और भारत में रेसिंग सीज़न की शुरुआत उनके लिए बिल्कुल फायदेमदं है। उनके मुताबिक, जनवरी-फरवरी का समय आमतौर पर प्री-सीज़न ट्रेनिंग का होता है और ऐसे मौसम में रेस करना शरीर के साथ-साथ मानसिक रूप से भी फ्रेश करता है।


अनुभव की अहमियत पर बात करते हुए बेल्जियम के 38 वर्षीय टिमोथी ड्यूपोंट, जो 2018 टूर डी फ्रांस का हिस्सा रह चुके हैं, युवा राइडर्स को संयम की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि लंबे स्प्रिंट में जल्दबाज़ी अक्सर नुकसान पहुंचाती है। असली समझ यही है कि सही समय पर ही पूरी ताकत झोंकी जाए। कई बार रेस के आखिरी पलों में शांत रहना ही जीत का रास्ता खोल देता है।


भारतीय टीम की तस्वीर देखें तो यहां अनुभव और युवापन का संतुलित मेल दिखाई देता है। कई बार के राष्ट्रीय चैंपियन नवीन जॉन साइक्लिंग को “पहियों पर खेला जाने वाला शतरंज” बताते हैं। कुवैत में जन्मे नवीन ने अमेरिका में पढ़ाई के दौरान साइक्लिंग शुरू की थी और अब 40 वर्ष की उम्र में अपने देश में अंतरराष्ट्रीय रेस करने को लेकर खासे उत्साहित हैं। उनका मानना है कि तकनीक, हाइड्रेशन और गियर के मामले में भारत भले ही पहले यूरोप से पीछे रहा हो, लेकिन हाल के वर्षों में सुधार साफ नज़र आता है।


पुणे को लंबे समय से भारतीय साइक्लिंग की पहचान माना जाता रहा है। दशकों पुरानी बॉम्बे-पुणे रेस की विरासत आज भी यहां जिंदा है। सूर्य थाथू और हर्षवीर सिंह जैसे राइडर्स इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने अन्य खेलों से साइक्लिंग की राह चुनी। हाल ही में हर्षवीर ने प्रोलॉग में भारतीयों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, जबकि नवीन और युवा साइक्लिस्ट विश्वजीत जनरल क्लासिफिकेशन में देश की उम्मीद बने हुए हैं।


विश्वजीत की कहानी भी प्रेरणादायक है। कोविड के दौरान खाली सड़कों पर घंटों की ट्रेनिंग ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया, जिसका नतीजा राष्ट्रीय रिकॉर्ड के रूप में सामने आया। उनका मानना है कि अनुशासन और निरंतर अभ्यास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहे हैं। वहीं टीम के कोच मैक्सत आयज़ाबायेव का कहना है कि रेस के हर दिन नए हमले देखने को मिलेंगे और भारतीय टीम उनसे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।


रेस के खत्म होने पर नवीन जॉन कहते हैं कि साइक्लिंग का सार दर्द सहने की मानसिकता में छिपा है, जहां हर राइडर अपनी सीमाओं से जूझता है। पुणे ग्रैंड टूर में यही जज़्बा देखने को मिलेगा, जब भारतीय और विदेशी साइक्लिस्ट एक-दूसरे को कड़ी चुनौती देते नज़र आएंगे।

प्रमुख खबरें

Wijk aan Zee में प्रज्ञानानंदा की धीमी शुरुआत, थकान और कैंडिडेट्स पर नज़र

Team Australia से हुए ड्रॉप, अब ओलंपिक में गोल्ड जीतना चाहते हैं स्टीव स्मिथ

New Zealand से घरेलू वनडे हार पर अश्विन की दो टूक, टीम इंडिया की प्रतिक्रिया पर उठे सवाल

New Zealand से हार के बाद रहाणे ने उठाए सवाल, वनडे टीम में बदलाव और भूमिका पर जताई चिंता