By एकता | Jul 28, 2026
पंजाब पिछले लगभग तीन दशकों से नशे के खिलाफ जंग लड़ रहा है। इस दौरान कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और अब आम आदमी पार्टी की सरकारें आईं। हर सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई का दावा किया, विशेष अभियान चलाए, टास्क फोर्स बनाई, नशामुक्ति केंद्र खोले और तस्करों पर शिकंजा कसने के वादे किए। इसके बावजूद सवाल आज भी वहीं खड़ा है, आखिर पंजाब ड्रग्स के दलदल से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा?
पंजाब में नशे की गंभीरता का अंदाजा संसद की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। समिति ने सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि करीब 3 करोड़ की आबादी वाले पंजाब में लगभग 66 लाख लोग किसी न किसी प्रकार के नशे का सेवन करते हैं। इनमें करीब 21.36 लाख लोग ओपिओइड का इस्तेमाल करते हैं, जबकि लगभग 6.97 लाख बच्चे भी इस समस्या से प्रभावित बताए गए हैं।
रिपोर्ट में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया। सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में इलाज के बाद सफल रिकवरी की दर केवल लगभग 1.5 प्रतिशत बताई गई। यानी इलाज के बाद भी अधिकांश मरीज दोबारा नशे की गिरफ्त में लौट जाते हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि पंजाब का ड्रग्स संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।
देश की सर्वोच्च अदालत भी पंजाब में बढ़ते नशे को लेकर चिंता जता चुकी है। एनडीपीएस (NDPS) मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि पंजाब में नशे की समस्या "चिंताजनक स्तर" तक पहुंच चुकी है और इससे निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। यह टिप्पणी बताती है कि अदालत इस समस्या को केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखती है।
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब पुलिस ने नशे के खिलाफ अभियान तेज किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 5 जुलाई 2022 से 7 जुलाई 2023 के बीच पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत 12,218 एफआईआर दर्ज कीं। इसके अलावा 2017-2021 और 2022 से अप्रैल 2026 तक के सरकारी आंकड़ों की तुलना भी यह दिखाती है कि नशे के खिलाफ कार्रवाई और जब्ती में वृद्धि हुई है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है।
अगर बड़ी मात्रा में ड्रग्स लगातार पकड़ी जा रही है, हजारों मामले दर्ज हो रहे हैं और लगातार गिरफ्तारियां हो रही हैं, तो आखिर इतनी बड़ी मात्रा में नशा राज्य तक पहुंच कैसे रहा है? जब्त की गई खेप यह भी संकेत देती है कि तस्करी का नेटवर्क अब भी सक्रिय है। केवल जब्ती के आंकड़े यह साबित नहीं करते कि नशे की आपूर्ति पूरी तरह रुक गई है।
पंजाब में ड्रग्स तस्करी का तरीका भी समय के साथ बदल गया है। पहले मुख्य चिंता सीमा पार से आने वाली हेरोइन थी। लेकिन हाल के वर्षों में पुलिस ने क्रिस्टल मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक ड्रग्स की भी बड़ी खेप बरामद की है। सुरक्षा एजेंसियां लगातार यह भी बताती रही हैं कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के जरिए ड्रोन के माध्यम से नशे की तस्करी की कोशिशें लगातार हो रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल ड्रग्स पकड़ लेने से समस्या खत्म नहीं होगी। इसके लिए तस्करों की आर्थिक व्यवस्था पर चोट, उनकी संपत्ति जब्त करना, बेहतर खुफिया तंत्र और विभिन्न एजेंसियों के बीच मजबूत समन्वय भी जरूरी है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी कई मामलों में जांच प्रक्रिया की कमियों पर सवाल उठाए हैं। अदालतों में अक्सर इन मुद्दों पर चर्चा होती रही है:
बरामदगी की सही प्रक्रिया,
जब्त ड्रग्स की सीलिंग और सैंपलिंग,
सबूतों की सुरक्षित चेन (Chain of Custody),
फॉरेंसिक जांच,
जांच और ट्रायल में देरी।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल गिरफ्तारी काफी नहीं होती। यदि जांच प्रक्रिया में तकनीकी खामियां रह जाती हैं तो अदालत में मामला कमजोर पड़ सकता है और इसका फायदा तस्करों को मिल सकता है। एक मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि पंजाब "नशे की गिरफ्त में कराह रहा है" और यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने के लिए गंभीर खतरा है। दूसरे मामले में अदालत ने कहा कि संगठित ड्रग तस्करी पंजाब के युवाओं और समाज को लगातार नुकसान पहुंचा रही है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट यह भी बताती है कि पंजाब की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पुनर्वास है। यदि सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में रिकवरी दर केवल 1.5 प्रतिशत है, तो केवल ड्रग्स की सप्लाई रोकने से समस्या खत्म नहीं होगी। विशेषज्ञों के अनुसार नशे की लत एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसके इलाज में दवाओं के साथ-साथ काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, परिवार का सहयोग और लंबे समय तक निगरानी जरूरी होती है। यदि मरीजों को उपचार के बाद लगातार सहयोग नहीं मिलता, तो उनके दोबारा नशे की ओर लौटने की आशंका बनी रहती है।
ड्रग्स का असर केवल अपराध तक सीमित नहीं है। नशे की वजह से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। इलाज का खर्च, बेरोजगारी और कर्ज जैसी समस्याएं हजारों परिवारों को प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली नशे की समस्या किसी भी राज्य की उत्पादकता और आर्थिक विकास को कमजोर कर सकती है।
पंजाब में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें सत्ता में आईं। हर सरकार ने राज्य को नशामुक्त बनाने का दावा किया। किसी ने सख्त कानूनों पर जोर दिया, किसी ने विशेष अभियान चलाए और किसी ने नई रणनीतियों का ऐलान किया। यह कहना सही नहीं होगा कि कोई काम नहीं हुआ। बड़ी मात्रा में ड्रग्स जब्त हुईं, हजारों गिरफ्तारियां हुईं और कई तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई भी हुई। लेकिन दूसरी ओर संसद की रिपोर्ट, लगातार दर्ज हो रहे एनडीपीएस मामले और अदालतों की टिप्पणियां यह भी बताती हैं कि नशे की समस्या अभी तक स्थायी रूप से नियंत्रित नहीं हो सकी है।
आज पंजाब का ड्रग्स संकट केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह शासन, प्रशासन और सरकारी संस्थाओं की क्षमता की भी परीक्षा बन चुका है। लाखों लोग अब भी नशे की चपेट में हैं। पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है। अदालतें बार-बार चिंता जता रही हैं। लेकिन पुनर्वास और रोकथाम के मोर्चे पर अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समस्या का समाधान केवल गिरफ्तारियों से नहीं निकलेगा। इसके लिए मजबूत जांच, प्रभावी अभियोजन, आधुनिक फॉरेंसिक व्यवस्था, ड्रग्स तस्करों की आर्थिक कमर तोड़ने वाली कार्रवाई, सीमा सुरक्षा, बेहतर पुनर्वास व्यवस्था और दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति की आवश्यकता होगी।