पंजाबी अखबारों की राय में मणिपुर पर संसद में सार्थक बहस की उम्मीद बहुत कम है

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Jul 29, 2023

पूर्वोत्तर के सीमावर्ती राज्य मणिपुर में दो महिलाओं के साथ दरिंदगी की घटना के बाद से देश में महिलाओं पर अत्याचारों को लेकर भारी आक्रोश है। मणिपुर के मसले पर संसद में भी भारी शोर-शराबा देखने को मिल रहा है। विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया है। अविश्वास प्रस्ताव पर अगस्त के महीने के पहले सप्ताह में चर्चा होगी। इस हफ्ते पंजाबी अखबारों ने मणिपुर के संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय बड़ी प्रमुखता से रखी है।

अखबार आगे लिखता है, मणिपुर में पिछले ढाई महीने से हिंसा का जारी रहना और महिलाओं पर इस तरह का अत्याचार कहीं न कहीं राज्य और केंद्र सरकार द्वारा इस संवेदनशील मामले की गंभीरता और राज्य में हो रही हिंसा के प्रति उदासीनता बरतने का नतीजा है। यदि राज्य इसी प्रकार हिंसा की आग में झुलसता रहा तो न सिर्फ जान-माल तबाह होने के साथ-साथ इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

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चंडीगढ़ से प्रकाशित पंजाबी ट्रिब्यून लिखता है- पूर्वोत्तर में विभिन्न उग्रवादी एवं आतंकवादी संगठन दशकों से सक्रिय हैं। कईयों का केंद्र और राज्य सरकार से समझौता है। ये संगठन मुख्यतः आदिवासी आधारित हैं। अखबार लिखता है, मणिपुर का वीडियो सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी राजस्थान, पश्चिम बंगाल और बिहार में महिलाओं के खिलाफ हो रहे जघन्य अपराधों को लेकर सवाल उठा रही है। बीजेपी यह भी आरोप लगा रही है कि विपक्षी दलों के नेता केवल बीजेपी शासित राज्यों में ही ऐसे मामले उठा रहे हैं लेकिन विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में हो रहे जघन्य अपराधों पर चुप रहते हैं। अखबार के मुताबिक, मणिपुर में सामूहिक हिंसा को सरकारी और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। मणिपुर में भयावह घटनाओं पर केन्द्र व राज्य सरकारें चुप्पी साधे रहीं।

सिरसा से प्रकाशित सच कहूं लिखता है- महिलाएं आदिकाल से ही पुरुषों के उत्पीड़न का शिकार होती आ रही हैं, जो वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के युग में भी जारी है। भले ही एक महिला पढ़-लिखकर प्रधानमंत्री और दुनिया के सर्वोच्च पदों पर पहुंची हो, लेकिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए कोई खास नतीजा नहीं निकल सका। हाल ही में मणिपुर राज्य के एक गांव में दो जनजातियों की आपसी दुश्मनी का नतीजा महिला को ही भुगतना पड़ा। दो-तीन महिलाओं को निर्वस्त्र कर घेर लिया गया। बड़ी और आश्चर्य की बात है कि ये सब गांव वालों की मौजूदगी में हुआ। इस घटना के घटित होने से ऐसा लगता है जैसे हम सीरिया जैसे देश में रह रहे हैं।

चंडीगढ़ से प्रकाशित देशसेवक लिखता है- मणिपुर की भयानक हिंसा के मामले पर संसद में सार्थक बहस की उम्मीद कम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में मणिपुर की हिंसा और वहां की बिगड़ती स्थितियों तथा स्थिति को संभालने के लिए सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाइयों के बारे में बोलना नहीं चाहते हैं। सभी नेता समझते हैं कि मणिपुर में जो किया गया है वह राजनीतिक रूप से उनके लिए फायदेमंद है। इसलिए ऐसा नहीं लगता कि मणिपुर की हिंसा और मणिपुर की कुकी महिलाओं के खिलाफ हुए जघन्य अपराधों पर संसद में कोई सार्थक बहस होगी।

जालंधर से प्रकाशित अजीत लिखता है- संसद का मानसून सत्र मणिपुर की भयावह घटनाओं में फंस गया है। सत्ताधारी पार्टी अपने बहुमत के बावजूद इस घटना को दूसरे राज्यों की घटनाओं से जोड़ना चाहती है, ऐसा करके वह इस घटना की गंभीरता को कम करने की कोशिश कर रही है। यदि भारतीय जनता पार्टी इस जघन्य घटना को लेकर सही दिशा में कोई कदम नहीं उठाती है तो निश्चित तौर पर केंद्र सरकार इस तरह का व्यवहार अपनाकर अपने घटक दलों को कमजोर करेगी, जबकि मुख्यमंत्री का इस्तीफा पहले ही ले लेना चाहिए था।

चंडीगढ़ से प्रकाशित रोजाना स्पोक्समैन लिखता है- कुकी और मैतेई लोगों का भारतीय सरकार और लोकतंत्र पर से विश्वास पूरी तरह क्यों हिल गया है। इस स्थिति को ‘गृहयुद्ध’ ही कहा जा सकता है और 90 दिन बाद भी मणिपुर के नागरिक सरकार की बात पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं। इसका असर भारतीय संसद में भी देखने को मिला जहां पूरे विपक्षी दल ने काले कपड़े पहनकर पूरे दिन संसद में मणिपुर का राग अलापा, लेकिन सरकार ने विपक्ष के इस विरोध को नजरअंदाज कर दिया। सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री को बोलने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इस मुद्दे पर बोलने के लिए गृह मंत्री ही काफी हैं।

जालंधर से प्रकाशित नवां जमाना लिखता है- मणिपुर तीन महीने से जल रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री ने संसद में बोलने से इनकार कर दिया। विपक्ष को पीएम का मुंह खोलने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का सहारा लेना पड़ रहा है। मणिपुर में बीजेपी की डबल इंजन सरकार है। कथित राष्ट्रवादी इस हद तक गिर गए हैं कि दो महिलाओं के नग्न वीडियो से शर्मिंदा होने के बजाय, इसे सरकार के खिलाफ साजिश बता रहे हैं। अखबार आगे लिखता है, आरएसएस लंबे समय से पूर्वोत्तर राज्यों में काम कर रहा है। उन्हें धर्म के आधार पर लोगों को तोड़ने में महारत हासिल है। इसी का नतीजा है कि आज मणिपुर जल रहा है।

जालंधर से प्रकाशित अज दी आवाज लिखता है- लोकसभा और राज्यसभा में मौजूदा शोर के पीछे एक ही बड़ा कारण है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष इस शोर की आड़ में कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार कर रहे हैं। जहां तक मणिपुर में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की बात है तो सत्ताधारी और विपक्षी दलों को महिलाओं से कोई सहानुभूति नहीं है, उनका एकमात्र उद्देश्य शोर मचाकर सदन का कीमती समय बर्बाद करना है। यदि सत्तारुढ़ दल और विपक्ष दोनों को मणिपुर की महिलाओं के प्रति सच्ची सहानुभूति होती साथ ही पश्चिम बंगाल, राजस्थान और कुछ अन्य राज्यों में महिलाओं के साथ जो हुआ है उस पर भी समान चर्चा पर सहमति बननी चाहिए थी। कांग्रेस और बीजेपी दोनों के मन में चोर हैं, इसलिए ये चर्चाएं अपनी-अपनी चोरियों को छुपाने के लिए भाग रही हैं। देश की जनता इस मामले में सब कुछ देख रही है। आने वाले समय में देशवासी कांग्रेस और बीजेपी दोनों से इस मामले में जवाब जरूर मांगेंगे।

पंजाबी जागरण एक लेख में लिखता है- राजनीतिक दलों को किसी भी पक्ष को भड़काने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। राज्य सरकार को सभी संगठनों और सशस्त्र समूहों के साथ मिल-बैठकर समस्या का समाधान करना चाहिए।

-डॉ. आशीष वशिष्ठ

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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