By अभिनय आकाश? | Sep 13, 2026
रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन का यह बयान सिर्फ एक सामान्य कूटनी नीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी पूरी वैश्विक व्यवस्था को सीधे चुनौती है। जब पुतिन एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की बात करते हैं तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विश्लेषक इसे सीधे तौर पर भारत की स्थाई सदस्यता के समर्थन के रूप में देख रहे हैं। एशिया से भारत आज ना केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से ग्लोबल साउथ का सबसे प्रभावी नेतृत्वकर्ता बनकर उभरा है। अब सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार क्यों अनिवार्य देखिए वर्तमान सुरक्षा परिषद का ढांचा 1945 की परिस्थितियों पर आधारित है। जहां केवल स्थाई सदस्यों के पास वीटो पावर है और पिछले आठ दशक में दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। पूरे अफ्रीकी महाद्वीप और लैटिन अमेरिका से एक भी स्थाई सदस्य नहीं है।
वैश्विक वित्तीय गवर्नेंस, आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान में वोटिंग अधिकार आज भी पश्चिमी देशों के पक्ष में झुके हैं। जो आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है। ब्रिक्स देश अब स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे तंत्रों के जरिए अधिक संतुलित और समावेशी वित्तीय प्रणाली तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। खैर पुतिन का यह रुख साफ करता है कि मल्टीपोलर विश्व व्यवस्था की मांग अब केवल एक विचार नहीं बल्कि एक आवश्यकता बन चुकी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान स्थाई सदस्य अपनी वीटो शक्ति और वर्चस्व को छोड़कर विकासशील देशों को उनके वाजिब हक देने के लिए तैयार होंगे?